सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंुश्र॑तसंहितौं ३9
विषय प्रष्ठ | विषय प विषय |
बात पित्त रमे क्वाथ क्षयरोगी को व्याञ्य ७१६ पाण्डुरोग चार प्रकारका है ९ ।
आदि ६८७ | धमं के अविरोधी विषय ७१६ | पूवर्प ०१
सन्निपात ज्वर मे क्वाथ आदि £ द्विचस्वारिशत्चमोऽभ्यायः खव पाण्डुरोग के रक्षण न |
सब्र उरो को नष्ट करने का गुल्मप्रतिषेध का व्याख्यान ७१७ | उशन्न ध ।
योग ६८६ | गुल्म पांच प्रकार का ७१७ | साध्य पाण्डुरोगी को धृत चूण 8
विषम उवरादि में भिन्नयोग ६६० | गुल्म का रक्षण ७१७ | आदि अनेक योग ०३९...
(प को नष्ट गुल्म के नाम काकारण ७१७ | पठ्चचत्वारिञत्तमोऽध्यायः |
र ६९० | गुल्म पकता नदी ७९७ | रक्त पित्त प्रतिषेध का
न २ सिद्ध किये तेल ६६० | पांच प्रकार का गुल्म कुपित व्याख्यान ह
0 ६६२ | होने पर तीन प्रकार के ७१७ | विदग्ध हआ रक्त दोनों मागो से
कफवातादि उवरां में ६६३ | पूवरूप ७१७ | प्रवृत्त होता है |
उपद्रव नाशक विशेष चिकित्सा ६६४ | वातः पित्त, कफः सन्निपातः साध्यासाध्य विचार ०
नस्य, विरेचन, स्नेह।दि ६९४ | रक्तजन्य गुल्म ७१८ | पूर्वरूप ० २
= ~ ७२४ ज्वर मे धृत देने का समय ६६६ | निरू श अनुवासनों से लाल ल (त
जवर मुक्त रोगी के लक्षण ६६७ | चिकित्वा` 8 || उन ७.५
ज्वर महादेव के क्रोध से ुभआ ६६७ | सलनिपातजन्य गुल्म मे तनिदोष ७९५ बदु
अतिसार प्रतिषेधका नाशक. चिकित्सा ७९६ भोषव ४ र
व्याख्यान | ही देनं ह
६६७ | चिकादि धृत िग्बायधृतः त २६
कारण ६६७ | दाधिक पूत, रसोनादि धृत॒ ७१६ | ऊर्ष्वमामी कौ
लक्षण व पंचतृणमूलादि घृत एर | विरेचन से ७२७ ,
सम््राति ६९७ । पानीयकषार ल उखके बाद् ७३७
अतिषार छः प्रकार का है ६६८ अरिष्ट ९८ मृद वमन सिद्धघृत पशप ७२७
पूचस्प ६ | शटा, दन्ती आदि की गोलियां ७२१ रने के व्यि लेह् तथाफल ७२७ |
असाध्य का लक्षण ६€ गुल्मरोगि्यों के लि | 2 पित्त नाच के छ्य अनेक
चिकित्छा (त ८ उद्ररोग, वात व्याधि आदिम ७२१ योग ७२७ ७३६ ,
एकचत्वारिखत्तमोऽध्यायः 8 श म ७२३ षट्चत्वारिसत्तमोऽध्यायः =
न त (१ शाः कर मू्खाप्रतिषेष का व्याख्यान ७३६
कारण तथा लक्षण ७१०.७१२ | योग मिन्न २ मूढ का करण ७३६
पूवरूप ७२४.७२७ | मोहमू्छी ७३९ `
अधः मृदु शोषन दे ७१४ निचस्वारिशत्तमोऽष्यायः || मृच्छा के छ प्रकार ७२६.
शोषन हो जाने पर. खाने हृद्गेग प्रतिषेष का व्याख्यान ७२७ | खश्चण | ७२६ .
७१४ | वाता र | ८
उपद्रव शान्त होने पर बृंहण ७ । < व प से ३ प्रकार रतजन्य, मयजनितृ . ।
व्यवायशोषी के लि क सान्नपरात् से चार प्रकार ७२७ | विषजनित मछ म इसके ६
समनाकेष्मि ७११ | जन्य रो किमे अनेक योग ८५
~ ओोषरोग का एक = | ङभजन्य, हृद्रोग मं ७२७-२८ || संन्यास सं्ावाला ७४५
` महीनेमंनाश - चतुञ्चत्वारिरत्तमोऽध्याय संज्ञ ७१५ | पाण्डुरोग प्रतिषेष का 1 आ जाने पर ७४१
हुन दि | व्यास्यान २ सप्रच त्वारिशत्तमोऽभ्यांयः ^
७१५ | पाण्डुरोग कै कारण ` ७३ पानस्य प्रतिषेष का 1
= = € व्ाख्यान - ७४२ |