भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

चित्रक के कषाय में सिद्ध दूध पीये । कुटजमूल की रसक्रिया में पिप्पल्यादि गण का प्रत्येप देकर मधु से खाये । तक का या दूध का ही आहार करते हुए महावात व्याधि में कहाँ हिंस्वादि चूर्ण खाये । क्षार लवणों से या चित्रकमूल के क्षारोदक में सिद्ध कुस्माषों ( अर्धस्विचन गेहूँ या जी को ) को खाये । पाटला, चिरन्चिता, बड़ी कटेरी, ढांक का क्षार, इनको घोलकर नितार कर घी में मिलाकर प्रतिदिन पीये । कुटजमूल वन्दाकमूल के कल्क को तक के साथ खाये । चित्रक, करञ्ज, सौंठ इनके कल्क को करञ्ज क्षार से खाये । क्षारोदक से सिद्ध घृत में पिप्पल्यादि गण का प्रत्येप देकर बरते । शीतल जल के अनुपान काले तिल के दो पल या एक पल प्रतिदिन प्रातः काल खाये । इनसे अग्नि बढ़ती है, और अर्श शान्त होते हैं ।

अर्शासि चातिसारश्च ग्रहणीदोष एव च ।

एषामग्निबले हीने वृद्धिर्वृद्धे परिशयः ॥

तस्मादग्निबलं रक्ष्यमेवु त्रिषु विशेषतः ।

तकदोषाग्निबलवित् त्रिविधं तत्प्रयोजयेत् ॥

हृत्तानि न विरोहन्ति तन्नेष गुदजानि तु ॥ १३ ॥

भूमावपि निषिक्तं तद्वहेतुक्तं तृणोलुपम् ।

किं पुनर्दंतिकायाम्नेः शुष्काण्यशोधिं देहिनाम् ॥

क्षोतःसु तकशुद्धेषु रसः सम्यगुपेति यः ।

तेन पुष्टिर्वलं वर्णः प्रहर्षश्चोपजायते ॥

वातश्लेष्मविकाराणां शतं चापि निवर्त्तते ।

नास्ति तत्कात्परं किञ्चिदोषधं कफवातजे ॥ चरक ॥

वि० मन्तव्यं—यापनार्थं—इन योगों का सेवन करने से रोग दवा रहता है ॥ १३ ॥

द्विपञ्चमूलोद्गन्तीचित्रकपथयानां तुलामाहृत्य जलचतुर्द्रेणि विपाचयेत् , ततः पादावशिष्टं कषायमादाय सुशीतं गुडतुल्लया सहोन्मिश्र्य घृतभाजने निक्षिप्य मासमुपेक्षेत यवपल्ले, ततः प्रातः प्रातर्मात्रां प्राययेत् , तेनाग्नौग्रहणीदोषपाण्डुरोगोदावर्त्तारोचका न भवन्ति दीप्तश्चाग्निर्भवति ॥

दशमूल, दन्ती, चित्रक और हरड इनके एक सौ पल लेकर चार द्रोण जल में क्वाथ करे । जब चौथाई शेष रह जाये तब उतारकर छानकर इसमें एक सौ पल गुड मिलाकर घृत से चिकने पात्र में भरकर एक मास तक जो के ढेर में रख दे । फिर प्रतिदिन इसमें से मात्रा में पीये । इससे अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डुरोग, उदावर्त्त, अरोचक नहीं रहते हैं और अग्नि बढ़ती है ॥ १४ ॥

पिप्पलीमरिचविडङ्गैलवालुकलोघ्राणां द्वे द्वे पल, इन्द्र-वातृण्यः पञ्च पलानि, कपित्थमध्यस्थ दग्ध, पथ्याफलानामर्धप्रस्थः, प्रस्थो धात्रीफलानां, एतद्वैकथ्यं जलचतुर्द्रेणि विपाच्य, पादावशेषं परिस्त्राय, सुशीतं गुडतुल्लयादेनोन्मिश्र्य, घृतभाजने निक्षिप्य, पञ्चमुपेक्षेत यवपल्ले; ततः प्रातः प्रातर्थावलमुपयुक्जीत । एष खल्वरिष्टप्लीहानि-

पंगाशौग्रहणीहृत्पाण्डुरोगशोफकुष्ठगुल्मोदरकुमिहरो बल-वर्णकरश्चेति ॥ १५ ॥

पिप्पली, मरिच, विडंग, ऐलवालुक, लोघ, दो दो पल, इन्द्रायण पाँच पल, कैथ का गूदा दस पल, हरड के फल आधा प्रस्थ, आँवले एक प्रस्थ इन सबको लेकर चार द्रोण जल में क्वाथ करे । चौथाई रहने पर छानकर इसमें दो सौ पल गुड को घोलकर घृत के पात्र में भरकर पन्द्रह दिन जो के ढेर में रख देवे । फिर प्रतिदिन प्रातः बल के अनुसार सेवन करे । यह अरिष्ट प्लीहा, अग्निमान्द्य, अर्श, ग्रहणी, हृदयरोग, पाण्डुरोग, शोक, कुष्ठ, गुल्म, उदर, कुमि को नष्ट करता है, बल और वर्ण को बढ़ाता है ॥ १५ ॥

तत्र, वातप्रायेषु स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनानुवा-सनमप्रतिषिद्धं, पित्तजेषु विरेचनम् , एवं रक्तजेषु संशमनं, कफजेषु शृंगवैरकुल्लथोपयोगः, सर्वदोषहरं यथोक्तं सव-जेषु, यथार्थोषधिषिद्धं च पयः सर्वविविति ॥

वातवृद्ध अशौं में स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन विषद्ध नहीं हैं । पित्तज अशौं में विरेचन, रक्तज अशौं में संशमन, कफजन्मों में सौंठ और कुल्लथी का योग निषिद्ध नहीं है । सन्निपातजन्म अशौं में कहीं हुई सर्व दोषहर चिकित्सा बरते । अपने २ दोषहर औषधियों से सिद्ध दूध सब में देना चाहिये ।

प्रवृत्तमादावशोभ्यो यो नियुह्नात्यनुद्विमान् ।

शोणितं दोषमनिलं तद् रोगान् जनयेद् बहून् ॥

तस्मात्सूते दुष्टरक्ते रक्तसंग्रहणं हितम् ॥

हेतुलक्षणकालक्षो बलशोणितवर्णत्रित् ॥

कालं तावदुपेक्षेत यावत्काल्ययमानुयात् ॥

चरक चि० अ० १४ ॥ १६ ॥

अत ऊर्ध्वं भलातकविधानमुपदेक्ष्यामः—भलातकानि परिपकान्यनुपहतान्याहृत्य तत एकमादाय द्विधा त्रिधा चतुर्धा वा छेदयित्वा कषायकल्पनेन विपाच्य तस्य कषायस्य मुक्तिमनुष्णां घृताभ्यक्ततालुजिह्वाः प्रातः प्रातर्रूपसेवेत, ततोऽपराह्णे क्षीरं सर्पिरादन इत्याहारः, एवमेकैकं वर्धयेद्यावन् पञ्चैति, ततः पञ्च पञ्चाभिर्वर्धयेद्यावन् सप्ततिरिति, प्राप्य च समतिमपकर्षयेद् भूयः पञ्च पञ्च यावत् पञ्चैति, पञ्चभ्यस्वैःकैकं यावदेकमिति । एवं भलातकसहस्रमुपयुज्य सर्वकुष्ठाशौभिर्विमुक्तो बलवान् रोगः शतायुर्भवति ॥ १७ ॥

इसके आगे भलातक विधि का उपदेश करेंगे—मही प्रकार के हुए और कौड़े आदि से न खाये हुये भिलावों को लाकर, उनमें से एक भिलावे को दो, तीन या चार टुकड़े बनाकर कषाय कल्पना से इनको पकाकर, इस कषाय की शुक्त मात्रा ( आधा पल ) को मनुष्य के ताजु-जिह्वा और ओष्ठ को घी से स्निग्ध कर पीने के लिये प्रतिदिन