सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सप्तमोऽध्यायः
अथातोऽश्मरी चिकित्सितं व्याख्यास्यासः ॥*९॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे अश्मरी चिकित्ला का व्याख्यान करगे--
जञेखा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
जोन अशमरी दारुणो व्याधिरन्तकप्रतिमो मतः ।
ओौषधैस्तरुणः साध्यः प्रृद्धर्छेदमहंति ॥२॥
तस्य पृषु रूपेषु स्तेहादिक्रम इष्यते ।
तेनास्यापचयं यान्ति ग्याघेमृडान्यरोषतः ।४॥
अश्मरी रोग भयानक है, यह रोग मृष्यु के समान (मारक)
है | नूतन उत्यन्न रोग ओषधिं से खाध्य दै, परन्तु बढ़ने पर
शख कम॑ से काटकर निकाली जाती दै । अश्मरी रोग के पूवरूपो मे स्तेहन आदि चिकित्खा करे ] इस चिकित्सा से इस
अश्मरी रोग के कारण सम्पूणरूप म नष्टो जाते ्ह।
वक्तव्य--अश्मरी में प्रथम एक न्युक्कीयस (केन्द्र) शरीर
के दोष से बनता है, यह न्युक्कीयस कफ सूप होता है। बस
इस केन्द्र के चारो ओर दोष एकत्रित होकर इसको बद़ाते जाते
है | स्नेहादि क्रमसेये दोष नष्टहोनेसे केन्द्रभी नष्ट दो
जाता है । नृतन आरम्भ हए रोग में ही यह चिकित्सा खभ
करती हे । इसी से निदान म कदा है-
“प्रकुपितः श्ठेप्मा मूनसं्क्तोऽनुप्रविश्य वस्तिमश्मरीं जनयति 1)” सुश्चत० नि° अ० ३।४।२.,४। पाषाणभेदो वसुको वशिराश्मन्तजो तथा।
जतावरी श्वदंष्रा च ब्रहती कण्टकारिका ॥५॥।
कपोतव ङ्ाऽऽतैगलः कच्चकोशोर कज्ज काः । दृक्षादनी भल्छुकश्च वरुणा शाकज फर्म् ॥६॥
यवाः कुरुत्थाः कोलानि कतकस्य फडानि च । ऊषकादिभ्रतीवापमेषां क्वाथेधृतं धृतम्॥।७॥ भिनत्ति ातसंभूतामरमरों क्िप्रमेव तु ।
पापाणमेद, वकपुष्य, अपामाग, घिरहटा, शतावरी
गोखरः, बड़ी कटेरी, कपोतवंका (ब्राह्मी याः सुवचा), अत्तः
(सहचर या वटी), कच्चक, खस, कुम्नक (गुजा), वन्दा, श्योनाक; वरणा, सागोन के फठ, जौ, कुलत्यी, वेर, निम॑ली,
इनके क्वाथ में ऊषकादि गण का प्रसतेप देकर घृत सिद्ध करे |
यह धूत वातजन्य अश्मरी को शीघ्र नष्ट करता दे ॥५-७॥ क्षारान् यवामूयषांञ्च कषायाणि पयांसि च ॥६॥ | भोजनानि च कुर्वीत बग॑ऽस्मिन् वातना्ने। `~ इख बातनाराक गण मे पेय क्षारो को, यवागू को, कषाय,
दूष ओर भोजन बनाये ॥त| ` | कुलः काशः सरो गुदर इटो मोरटोऽश्ममिव् ॥९॥ | ``
सुश्रतखहिता स
वरी विदारी वाराहो शालिमूलब्रिकण्टकम् | ( भ
मल्ट्ूकः पाटलाः पाठा पत्तुरोऽथ कुरुण्टिका ॥
पुननेवा जिरीषश्च क्वथितास्तेषु साधितम् । ०॥
घृतं जिखाजमधुकबीजेरिन्दीवरस्य च ॥११॥ त्पुसेवसकादीनां बीजेश्वावापितं जञ॒भम् ।
मिनत्ति पित्तसंभूतामर्मरी क्षभरमेव तु ॥१२॥
क्षारान् यवामूयुषांश्च कषायाणि पयांसि च । मोजनानि च कुर्वीत बगे ऽस्मिन् पित्तनाशने ॥१३॥ |
कुश, काश, सखरकण्डा, गुन्द्रा ( एरक ), इस्कट, मोरटं
( इक्तुमूक ), पाषाण मेद्, शतावरी, विदारी, वाराहीकन्द
शालीमूल, गोखरू, श्योनाक, पाटला, पाठा, मची, क्षिष्ट
पुननवा, शिरीष-इनके क्वाथ मे शिलाजतु, मुरेहटी, कमल.
गद्वा, खीरा-ककड़ी-कूष्माण्ड आदि के बीजों के कल्क से सिदध
करिया घृत पित्तजन्य अश्मरी को शध नष्ट कर देता दै । इष
पित्तनाशक वगं में पेय क्षारो को, यवागू, यूष, कषाय, दूष
ओर भोजनों को बनाये ॥६-१३॥ गणो वरुणकादिस्तु गुगगुस्वेखाहरेणवः। कुष्ठभद्रादिमरिच चित्रकै ससुराहयः ॥१४॥
एतेः सिद्धमजासर्पिरूषकादिगणेन च ।
भिनत्ति कफसंभूतामश्मरीं क्षिप्रमेव तु ॥१५॥
कारान् यवागयुषाश्च कषायाणि पयांसि च।
भोजनानि चं कुर्वीत वर्गेऽस्मिन् कफएनाशने ॥१६॥
वरुणादि गण, गुग्गुलु, इलायची, हरेणु, कूठ, मद्रदान्याः |
दिगण, मरिच, चित्रक, देवदार, इनके क्वाथ मे ऊषकादि
गण का कल्क देकर सिद्ध क्रिया बकरी का धृत कषजन `
अश्मरी को शीध नष्ट करता है । इस कफ नाशक वग म क्षा
यवागू , यूष, कषाय, दूध ओर मोजन सिद्ध करे ॥१४-१९।
` पिचुकाङ्कोखकतकशकेन्दीवरजेः फलः ।
चूर्णितैः सगुडं तोयं शकराशमनं पिवेत् ॥९॥
करीर, अंकोल, नि्म॑लीफल, सागोन, कमल के ¢
इनका चूणं करे। इस चूण मँ चूण के वराबर् गु (1
गरम पानो से पिलाये । ` यह शरा नाक दै । ए
परिमाण-- ` |
चूणं चूणंखमो देयो मोदके द्विगुणो गुडः ॥१५॥
क्रौञ्चोष्टूरासभास्थीनि श्वद॑ष्टूा ताखमूटिक ।
अजमोदा कदम्बस्य मूढं नागरमेव च ॥१८॥
पीतानि शकंरां भिन्धुः सुरयोष्णोदकेन वा ।
कोच पक्षी, ऊंट ओरं गे कौ अस्थि की भर, 1
भूसली, अजवायन, कदम्ब का मूक, खोट, इनको खया चा `
पानी से पीने पर शकरा नष्ट होती द ॥१८॥। रं त्रिकण्टकस्य बोजानां चूण" माध्िकसंयुतम् ॥ ९.
अविक्षीरेण सप्रादमरमरीमेदनं पिबेत्।