सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
स चेदगृहीतशल्ये तु बिबृताश्चो विचेतनः । हतवत्सलम्बशोर्षश्च निर्बिकारो मृतोपमः ॥३१॥ न तस्य निर्हरेच्छल्यं निर्हरेत् त्रियेत सः । विना त्वेतेषु रूपेषु निर्हितं प्रयतेत वै ॥३२॥
अश्वरी के हाथ में आने से यदि रोगी की आँखें स्तम्भ हो जाती हैं, वह मूर्च्छित हो जाता है, मरे हुए के समान गर्दन लटका देता है, चेष्टा रहित हो जाता है, मृत पुरुष की भाँति दीखता है तो ऐसे मनुष्य की पत्थरी को न निकाले, क्योंकि निकालने से वह मर जाता है । जिस में उपर्युक्त लक्षण न हों, उसमें अश्वरी निकालने का प्रयत्न करे ॥३१,३२॥
ततः सन्धे पार्श्वं सेवनी यवमात्रेण मुक्त्वाऽवचारयेच्छस्त्रमश्वरीप्रमाणं दक्षिणतो वा क्रियासौकर्यहेतोऽरित्येके, यथा सा न भिद्यते चूर्ण्यते वा तथा प्रयतेत, चूर्णमल्पमप्यवस्थितं हि पुनः परिवृद्धिमेति, तस्मात् समस्तामप्रवक्त्रेणाददीतः; खोणां तु वस्तिपार्श्वगतो गर्भाशयः सन्निष्ठः, तस्मात्तासांमुत्सन्नवच्छब्दं पातयेत् । अतोऽन्यथा खल्वासां मूत्रखावीं व्रणो भवेत्, पुरुषस्य वा मूत्रप्रसेकक्षणतान्मूत्रक्षरणम्; अश्वरीव्रणादृते भिन्नवस्तिरेकधाऽपि न भवति, द्विधा भिन्नवस्तिराश्वरिको न सिध्यति, अश्वरीव्रणतिमित्तेकधा भिन्नवस्तिर्जावति, क्रियाभ्यासाच्छास्त्रविहितच्छेदान्नित्यन्दपरिवृद्धित्वाच्च शल्यस्येति । उद्धृतशल्यं तूष्णोदकद्रोण्यामवगाह्य स्वेदयेत्, तथा हि वस्तिरसूजा न पूर्यते; पूर्णं वा क्षीरवृक्षकषायं पुष्पनेत्रेण विदध्यात् ॥
फिर वाम पार्श्व में सेवनी से जो भर बचाकर, अश्वरी के प्रमाण से शस्त्र चलाये । कई आचार्यों का कहना है कि कर्म की सुगमता के लिये दक्षिण पार्श्व में शस्त्र कर्म करें । पत्थरी दृष्टे नहीं, चूरा न बने, ऐसा यत्न करे, क्योंकि थोड़ा सा भी चूरा फिर पत्थरी को बढ़ा देता है । इसलिये सम्पूर्ण पत्थरी को अप्रवक्त्र शस्त्र से निकाल ले । त्रियों में वस्ति के पार्श्व में ही गर्भाशय रहता है । इसलिये इनमें ऊपर की ओर धारवाले शस्त्र न चलाये । नहीं तो इनमें मूत्रखावी व्रण हो जाता है । अथवा पुरुष में भी मूत्रमार्ग में आघात होने पर मूत्रक्षरण होता है । अश्वरी व्रण के बिना भिन्न वस्ति फिर नहीं उड़ती । अश्वरी कर्म में भी दो स्थान से (ऊपर और नीचे दोनों ओर) विदीर्ण हुई वस्ति नहीं उड़ती । अश्वरी व्रण के कारण एक तरफ से विदीर्ण वस्ति उड़ जाती है, इसलिये रोगी जीता है । क्योंकि—उष्णोदक, क्षीरवृक्ष कषाय आदि उपचार के निरन्तर सेवन करने से, शस्त्र के अनुसार छेदन करने के कारण, तथा नित्यन्द (मूत्र) को बढ़ानेवाले यवगू गुड़ आदि के खाने से रोगी जीता है । शल्य निकालकर गरम पानी के टब में बैठकर स्वेद देवे । इस प्रकार करने से वस्ति में रक्त नहीं भरता ।
यदि रक्त भर जाये तो पुष्प नेत्र से बरगद आदि क्षीरवृक्षों के कषाय से धो देवे ।
वक्तव्य—पुरुषों में शस्त्र कर्म मण्डलाग्र (स्कैल्पर) से करें, त्रियों में बृद्धिपत्र (विस्ट्री) से करें, ऐसा ग्रन्थ का अभिप्राय दीखता है । 'नित्यन्दपरिवृद्धत्वाच्च' गधी ने इतना ही पाठ माना है, इसको भी इतना ही ठीक लगा है, इसलिये 'शल्यस्य' यह पाठ छोड़ दिया है ॥३३॥
भवति चात्र—
क्षीरवृक्षकषायस्तु पुष्पनेत्रेण योजितः ।
निर्हरेदश्वरीं तूष्णं रक्तं वस्तिगतं च यत् ॥३४॥
इसमें श्लोक भी है—पुष्पनेत्र से प्रयुक्त किया बरगद आदि क्षीरवृक्षों का कषाय शीघ्र ही वस्तिगत अश्वरी को और रक्त को निकाल देता है ॥३४॥
मूत्रमार्गविशोधनार्थं चास्मै गुडसौहित्यं वितरेत्; उद्धृत्य चैन मधुघृताभ्यक्त्रणं मूत्रविशोधनद्रव्यसिद्धां मुष्णां सघृतां यवगू पाययेतोभयकार्यं त्रिरात्रं, त्रिरात्रादुर्धं गुडप्रगाढेन पयसां मूद्रोदनमल्पं भोजयेद्दशरात्रं (मूत्रासविशुद्धार्थं व्रणकलेदनार्थं च), दशरात्रादुर्धं फलाभ्लेजां डगलरसंरूपाचरेत्, ततो दशरात्रं चैतमप्रमत्तः स्वेदयेत् स्नेहेन द्रवस्वेदेन वा, क्षीरवृक्षकषायेण चास्य व्रणं प्रक्षालयेत्, रोधमधुकमञ्जिष्टाप्रापौण्डरीककलैकैर्ब्रणं प्रतिग्राहयेत्, एतेष्वेव हरिद्रायुतेषु तैलं घृतं वा विपक्वं व्रणाभ्यञ्जनमिति, स्यात्तशोणितं चोत्तरवस्तिभिरूपाचरेत्, सप्तरात्राच्च स्वमार्गमप्रतिपद्यमाने मूत्रे व्रणं यथोक्तं विधिना दृहेदग्निना, स्वमार्गप्रतिपन्ने चोत्तरवस्त्यास्थापनानुवासनेरूपाचरेन्मधुरकषायैरिति, यहच्छया वा मूत्रमार्गं प्रतिपन्नामन्तरासक्तां शुक्राश्वरीं शर्करां वा स्नोत् साऽपहरेत्, एवं चाशक्ये विदार्य नाडीं श्लेषणे बडिशेनो द्ररेत् । रुद्धव्रणश्राक्नाशवनगनागरथद्रुमान् नारोहेत वर्षं, नाप्सु प्लवेत, मुञ्जीत वा गुरु ॥३५॥
मूत्रमार्ग के शोधन के लिये इस रोगी को पेटभर गुड़ खिलाये । गरम पानी के टब में से इस रोगी को निकालकर व्रण पर मधु और घी का लेप करे, और पंचतुण्णमूल, गोबर, कृष्माण्ड, पाषाण भेद आदि मूत्र शोधन द्रव्यों से सिद्ध की, घृत मिश्रित गरम यवगू को तीन दिन तक प्रातः और सायं दोनों समय देवे । तीन दिन के पीछे दस दिन तक, प्रभु गुड़वाले दूध के साथ गला हुआ कोमल भात थोड़ा सा देवे (जिससे मूत्र और रक्त का शोधन हो और व्रण में आर्द्रता आये) । दस दिन पीछे दाडिम आदि खड़े फल और जांगल मांस रस खाने को देवे, फिर दस दिन तक बिना