भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 482

४२६

सुश्रुतसंहिता

[ ॥ २ ]

तत्र प्रथममेव कुष्ठिनं स्नेहपानविधानेनोपादयेत् । मेघशृङ्गीश्वद्वृत्ताङ्गोष्ट्रागृह्णीयैषमूलीसिद्धं तैलं घृतं वा वातकुष्ठिनां पानाभ्यङ्गयोर्विदध्यात् , धवाश्चकर्ण- ककुभपलाशपिचुमर्दपर्टकमधुरक्रोशसमझासिद्धं सर्पिः पित्तकुष्ठिनां, प्रियाल्लाशालारवधनिस्वसप्तपणं चित्रकमरि- चवचाकुष्ठसिद्धं रत्नेषकुष्ठिनां भल्लातकामयाविदङ्गसिद्धं वा सर्वेषां तुवरकतैलं भल्लातकतैलं वेति ॥७॥

इसमें सबसे प्रथम कुछ रोगों को वमन आदि संशोधन देकर स्नेहपानविधि से चिकित्सा करें। मेघशृंगी, गोखरू, शाङ्गेशा (काकतिका या काकजंवा), गिलोय और दशमूल से सिद्ध घृत या तेल वातकुष्ठ रोगियों में पान और अभ्यंग के लिये बरते। धव, अश्चकर्ण, अजुन, पलाश (डाक), नीम, पित्तापड़ा, मुलहठी, लोथ, लूई मुई (या मजीठ) से सिद्ध घृत पिष्ट कुष्ठियों में पीने और अभ्यंग के लिये देवे। पियाल, शाल, अमलतास, नीम, सप्तपर्ण, चिवक, मरिच, वच, कूठ इनसे सिद्ध किया घृत (या तैल) कफ कुष्ठियों के पीने और अभ्यंग के लिये बरते। अथवा मिलावा, हरङ्ग विडंग से सिद्ध किया घृत कफ कुष्ठ रोगियों में बरते। सब प्रकार के कुष्ठों में तुवरक तेल या मिलावे का तेल बरते।

वि० मन्तव्य—तुवरक तेल का वर्णन चि० अ० ३ में देलिये, कहा जाता है कि सुप्रसिद्ध चालमोगरा तैल ही तुवरक तैल है। इसको ४-६ मासे खाने से वमन एवं विरेचन हो जाता है और अल्पमात्रा में खाने से रक्त शोधन होता है। अभ्यङ्ग से स्वदीप शान्त हो जाते हैं ॥७॥

सप्तपर्णारवधानि विषैश्चुरपाठाकटुरोहिण्यमुतात्रिफला पटोलपिचुमर्दपर्टकटुरालभात्रायमाणामुस्ताचन्दनपद्मा - द्रुमकहरिद्रोपकृत्याविशालामूर्वाशतावरीसारिवेन्द्रयवाटरू- पकषडन्मन्थामधुकभृन्निम्बगुष्टिका इति समभागः कल्कः स्यात् , कल्काद्यतुर्गुणं सर्पिः प्रक्षिप्य तद्द्विगुणो धात्रीफल- रसस्तत्तुर्गुणा आपस्तदेकध्वं समालोड्य विपचेत् , एतन्महातिक्रकं नाम सर्पिः कुष्ठविषमञ्जररक्तपित्तहृदो- गोन्मादापस्मारगुल्मपिडकासूदरगलगण्डगण्डमालाश्रीप- द्पाण्डुरोगविसर्पोर्णं पाण्ड्यकण्डूपासादीच्छमयेदिति ॥८॥

महातिक्रकघृत—सप्तपर्ण, अमलतास, अतीस, तालमखाना, कटुकी, गिलोय, त्रिफला, परवल, नीम, पापड़ा, धमासा, त्राय- माण, मुस्ता, चन्दन, पद्माल, हल्दी, पिप्पली, बड़ी इन्द्रायण, मूर्वा, शतावरी, सारिवा, इन्द्र जी, अङ्गुस, वच, मुलेहठी, चिरायता, बेर प्रत्येक समान भाग लेकर इनका कल्क करें। कल्क से चार गुणा घी, घी से दुगना आँवले का स्वरस, स्वरस से चार गुणा पानी, सबको एक साथ मिलाकर घृत सिद्ध करें। यह महातिक्रक नामक घृत कुष्ठ, विषमञ्जर, रक्तपित्त, हृदय रोग, उन्माद, अपस्मार, गुल्म; पिडका, रक्तप्रद, गन्ध-

गण्ड, गण्डमाला, रलीपद, पाण्डुरोग, विसर्प, अर्श, नपुंसकता कण्डूपासा आदि को नष्ट करता है।

वक्तव्य—एधि शब्द एक बार की न्याई गाय तथा बेर के लिये है, यथा—‘अथ एधिः सक्तप्रसृतगवोवदरयोः त्रियाम्’ इति मेदिनी। इससे बेर लेना होता है। चरक में “पाठा” पढ़ा है। वह इस पाठ में नहीं है। इसी प्रकार श्वेत और कृष्ण दोनों सारिवा उसमें हैं ॥७॥

त्रिफलापटोलपिचुमर्दपर्टकटुरोहिणीदुरालभात्राय- माणाः पर्टकच्छैतेषां द्विपलिकान् भागाङ्गजलद्रोणे प्रक्षिप्य पादावशेषं कषायमादाय कल्कपेष्ट्याणीमानि भेषजान्यधप- लिकानि त्रायमाणामुस्तेन्द्रयचन्दनकिरातितिकानि पिप- त्यच्छैतानि घृतप्रस्थे समावाप्य विपचेत् , एतत्तिक्रकं नाम सर्पिः कुष्ठविषमञ्जरगुल्माशौग्रहणीदोषशोफपाण्डुरोगवि- सर्पपाण्ड्यशमनमूर्ध्वजत्रुगतरोगस्तं वेति ॥८॥

तिक्रकघृत—त्रिफला, पटोल, नीम, अङ्गुस, कटुकी, धमासा, त्रायमाणा और पित्तापड़ा ये प्रत्येक दो पल लेकर एक द्रोण जल में डालकर क्वाथ विधि से चौथाई क्वाथ शेष रक्खें। इसमें त्रायमाण, मुस्ता, इन्द्रजी, चन्दन, चिरायता, पिप्पली प्रत्येक आधा पल लेकर इनको पीसकर कल्क मिलायें। इसमें घी एक प्रस्थ डालकर पकायें। यह तिक्रकघृत कुष्ठ, विषमञ्जर, गुल्म, अर्श, ग्रहणीदोष, शोफ, पाण्डुरोग, विसर्प, नपुंसकता को नष्ट करता है, ऊर्ध्व जत्रु के रोगों को नष्ट करता है ॥८॥

अतोऽन्यतमेन घृतेन स्निग्धस्त्रिचरस्यैका द्वे तिस्रश्च- तक्षः पञ्च वा सिरा विध्येत् , मण्डलानि चोत्सन्नान्य- वलिखेदभीक्षणः प्रच्छयेद्वा समुद्रफेनशक्रगोजाकाकोडुम्ब- रिकापत्रैर्वाडवघृध्यालेपयैश्चाक्षार्सर्जरसरसाञ्जनप्रपुत्राडाव- ल्गुजतेजोवत्यश्रमारकार्ककुटजारेचतमूलकलैर्मूर्त्रपिष्टैः पि- त्तपिष्टैर्वा, स्वर्जिकातुत्थकासीसविडङ्गागारधूमचित्रक- टुकसुधाहरिद्रासैन्धवकलकैर्वा, एतान्येवावाप्य क्षारकल्पेन निःसृते पालाशे क्षारे ततो विपाच्य फाणितमिव संजातमवतार्य लेपयेत् , ज्योतिष्कफललाक्षामरिचपिप्पली सुमनः पत्रैर्वा हरितालमनःशिलाकर्क्षीरतिलगिमुमरिच- कलकैर्वा, स्वर्जिकाकुष्ठतुत्थकुटजचित्रकविडङ्गमरिचरोध- मनःशिलाकलकैर्वा, हरीतकीकरजिकाविडङ्गसिद्धार्थक- लवणरोचनावल्लुजहरिद्रा कलकैर्वा ॥९०॥

सर्वे कुष्ठापहाः सिद्धा लेपः सम प्रकीर्तिताः । इनमें से किसी एक घृत से स्नेहन करके, स्वेदन देकर, एक, दो, तीन, चार या पाँच सिरा का वेषन करें। ऊँचे उठे मण्डलों में बार-बार लेखन करें। अथवा पाछना करें। समुद्र- फेन, सागोन, गाजवाँ कठगूलर, इनके पत्तों से रगड़कर, लाव, राल, रसौत, पनवाड़ के बीज, बावची, तेजबल, कनेर, आक, कुटज, अमलतास की मूल, इनके कल्क को गोमूत्र से या गाय के पित्त से पीसकर लेप करें। सर्जक्षार, तुत्थ, का सीख-