सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ९ ]
एकठा करके लेप करे । इस प्रकार एक मास प्रयोग करने पर यह शिवत्र को नष्ट कर देता है ॥१६.२०॥
क्षारे सूदग्धे गजगण्डजे तु गजस्थ मूत्रेण बहुसुते च । द्रोणप्रमाणे द्रुमभागयुक्तं दन्त्वा पचेद्वीजमवल्युगजस्थ ॥२१॥ पतयद्वा चिक्कणतामुपेति तदा समस्तं गुटिका विदध्यात् । शिवत्रं प्रलिम्पेदथ संप्रघृष्य तथा त्रजेदानु सर्बर्णभावम् ॥
हाथी की लीद को भली प्रकार जलाकर बनाये क्षार की हाथी के मूत्र में घोलकर कई बार नितार ले । इसके एक द्रोण में दसवां भाग बावची के बीज मिलाकर पकाये । पकाते समय जब कड़छी पर लगे तब इसकी गोळियाँ बना ले । शिवत्र को घिसकर उसपर इनका लेप करे, इससे त्वचा के समान रंग आता है ।
वक्तव्य—जलपिप्पली बहुत गरम है, प्लेग की गाँठ पर इसका कल्क बांधते हैं । इससे गाँठ पक जाती है, या बैठ जाती है । 'जलकण्डजे' के स्थान पर 'गजलेण्डजे' पाठ होने पर हाथी की विद्या अर्थ है । यह भी बहुत गरम है, गर्भधृति को रोकने के लिये इसे बरतते हैं ॥२१-२२॥
कषायकल्पने सुभावितां तु जलं त्वचा चूतहरीतकीनाम् । तां ताम्रदीपे प्रणिधाय धीमान् वर्त्ति वटक्षीरसुभावितां तु ॥
आदीप्य तज्जातमसीं गृहीत्वा तां चापि पथ्याम्भसि भावयित्वा ।
संप्रच्छितं तद्वहुगः किलासं तेलेन सित्तं कटुना प्रयाति ॥२४॥
आम और हरड की छाल को कषाय विधि से क्वाथ करके इस क्वाथ से रूई की वर्त्ति को भली प्रकार भावित करके, कटुतैल से तर करके, ताम्र के दीपक में रखकर, जलाये । इसके जलने से जो मसी (स्थार्ही) बने, उसे हरड के क्वाथ और वट क्षीर से भावित करके, कटुए तेल (सरसों का तेल) में मिला कर, किलाश को बहुत बार पाळकर, इससे लेप करे । इससे किलाश नष्ट हो जाता है । (भाव्यद्रव्यसमं क्वाथं क्वाथश्चा-धोवशेषितः ॥२३-२४॥)
आवल्युजं बीजमग्रथं नदीजं काकाहानौदुम्बरी या च लाक्षा ।
लौहं चूर्णं मागधी ताच्छैशलं तुल्याः कार्याः कृष्णवर्णास्तिलाश्च ॥२५॥
वर्त्तिं कृत्वा तां गवां पिप्त्पिष्टां लेपः कार्यः शिवत्रिणां शिवत्रहारी ।
लेपात् पिप्त्तं शैखिनं शिवत्रहारी होबेरं वा दग्धमेतेन युक्तम् ॥२६॥
बावची के बीज, उत्तमस्वर्णमाक्षिक, कठगूलर, लाख, लोहचूर्ण, पिप्पली, रसौत, इन सब के बराबर काले तिल इनको गाय के पित्त में पीसकर गोली बना ले । शिवत्रों पर इनका
लेप करने से शिवत्र नष्ट होते हैं । होबेर को जलाकर मोर के पित्त में मिलाकर लेप करने से भी शिवत्र नष्ट होते हैं ॥२५,२६॥
तुत्थाकलटुकाव्योषसिहाकह्यमारकाः । कुष्ठावल्युजभलातक्षीरिणीसर्षेयाः स्नुही ॥२७॥ तिल्वकारिष्टपीलूनां पत्राण्यारन्वघस्य च ।
बीजं विडङ्क्शिवत्रहन्त्रोहिरिद्रे वृहतीद्रव्यम् ॥२८॥
आभ्यां शिवत्राणि योगाभ्यां लेपान्नइयन्त्यशेषतः ।
(१) तुत्थ, हरताल, कुटकी, त्रिकुट, सिंह (अङ्गुस), आक, मनेर, कूठ, बावची, भिलावा, दूची सरसों और थोर, (२) तिल्वक, नीम, पीलू, अमलतास के पत्ते, वायविडंग और कनेर के बीज, हल्दी, दारुहल्दी, कटेरी, बड़ी कटेरी, इन दो योगों के लेप से शिवत्र सम्पूर्ण रूप में नष्ट होते हैं ॥२७-२८॥
वायसीफलगुतिक्तानां शतं दन्त्वा पृथक् पृथक् ॥२९॥ द्रे लोहरजसः प्रस्थे त्रिफलाच्छादकं तथा ।
त्रिद्रोणेऽप्यां पचेद्यावद्भागौ द्रावसनादपि ॥३०॥
शिष्टौ च विपचेद् भूय एतैः शलद्वप्रपेषितैः ।
कल्कैरिन्द्रव्यव्योषत्वरदारुचतुरङ्गुलैः ॥३१॥
पारावतपदीदन्तीबाकुचीकेशराह्वयैः ।
कण्टकार्यां च तत्पक्वं घृतं कुष्ठिषु योजयेत् ॥३२॥
दोषधारत्वाश्रितं पानादम्यङ्कात्स्वर्गात् तथा ।
अप्यसाध्यं नृणां कुष्ठं नाम्ना नीलं नियच्छति ॥३३॥
वायसी (काकतिका, मकोय), कठगूलर (या अंजीर) कुटकी, प्रत्येक एक सौ पल, लोह चूर् द्रो प्रस्थ, त्रिफला तीन आङ्क, असन (विजय सार) दो प्रस्थ, मिलाकर तीन द्रोण जल में पकाये । जब एक भाग जल जल जाये, दो भाग बच जाये, तब उतार कर छान ले । इसमें इन्द्रजो-त्रिकुट, दालचीनी, देवदारु, अमलतास, पारावतपदी, जामाल्लोटा, बावची, नाग-केशर, कटेरी, उनका बारीक पीसा कल्क मिलाकर आदक घृत को सिद्ध करे । यह घृत कुष्ठ रोगियों में देवे । इस घृत के पीने से दोष धातुओं में स्थित तथा अश्रयंग में त्वचा में स्थित, असाध्य कुष्ठ भी अच्छा हो जाता है । इसका नाम नीलघृत है ॥
त्रिफलात्तवकं त्रिकुटकं सुरसा मदयन्तिका ।
वायस्यारन्वधश्चैषां तुलां कुर्यात् पृथक् पृथक् ॥३४॥
काकमाच्यकवरुणदन्तीकुटजचित्रकात् ।
दार्बिनिदिग्धिकाभ्यां तु पृथग्द्रुशपलं तथा ॥३५॥
त्रिद्रोणेऽप्यां पचेद्यावत् घटप्रस्थं परिशेषितम् ।
शकुन्धसदधिक्षीरमूत्राणां पृथगाङ्कम् ॥३६॥
तद्वद्घृतस्य तत्साध्यं भूनिम्बव्योषचित्रकैः ।
करञ्जफलनीलिकाश्यामावल्युजपीलुभिः ॥३७॥
नीलिनीनिम्बकुसुमेः सिद्धं कुष्ठापहं कृतम् ।
प्रक्षुणादङ्गसावण्यं शिवत्रिणां जनयेन्नृणाम् ।
भगन्दरं कृमीनर्शां महानीलं नियच्छति ॥३८॥
महानीलघृत—हरड, बहेडा, आंवला की बकली, सौंद, मरिच, पीपल, तुलसी, मेंहदी, मकोय, अमल तास, ये प्रत्येक