भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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शारीरस्थानम्

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महावज्रक तैल—सरसों, नाटाकरज, हरबी, दारूहरदी, रसौत, कुटज, पनवाड़, सप्तपर्ण, इन्द्राक्ष, लाख, राल, आक, शरिवा, अमलतास, थोर, शिरीष, तुवरक, कुटज, भिलवा, बब, कूठ, वायविडङ्ग, मजीठ, कलिहारी, चित्रक, चमेली, कडुई तुम्बी, गन्धक, मूली, सेन्धव, कनेर, घर का धुंवासा, मीठा तेलिया, कमोला, धिन्दूर तेजवल, तुथ, इन सबको समान भाग लेकर पीस लेवे। इन से दुगुना गोमूत्र, गोमूत्र के बराबर तिलतैल, तिलतैल से चार गुण करज या सरसों का तेल मिलाकर इनसे तैल सिद्ध करें। यह तैल अतिशक्तिशाली महा-गुणवान् है। इस तैल के लगाने से सब कुष्ठ, गण्डमाला, मगन्दर, नाडीब्रण, सब बिना सन्देह के नष्ट हो जाते हैं। इस तैल का नाम महावज्रक है, अतिशय गुणकारी है ॥ ५७-६३ ॥

पित्तावपैर्मैत्रपिष्टैस्तैलं लाक्षादिकैः कृतम् ॥६४॥

सम्राहं कटुकालाब्दां निदधीत चिकित्सकः।

पीतवन्तं ततो मात्रां तेनाभ्यक्तं च मानवम् ॥६५॥

शाययेदातपे तस्य दोषा गच्छन्ति सर्वशः।

लाक्षादि गण को अथवा महावज्रक में पड़े लाक्षा सर्जरस आदि को पीसकर, गोमूत्र में (तैल से चार गुणे) गाय के पित्ताका प्रक्षेप देकर सिद्ध किया तिलतैल वैद्य, सात दिन कडुए तुथे के पात्र में रख देवे। फिर इस तैल को मात्रा में पीये, और शरीर पर मालिश करे। रोगी धूप में सोये रहे, इससे दोष सम्पूर्ण रूप में निकल जाते हैं ॥ ६४, ६५ ॥

सुतदोषं समुत्थाप्य स्नातं खदिरवारिणा ॥६६॥

यवगं पाययेदेन साधितां खदिराम्बुना।

दोषों के निकल जाने पर रोगी को धूप से उठाकर खैर के क्वाथ से स्नान कराये। खैर के क्वाथ में बनाई यवगू इस रोगी को पीने के लिये देवे ॥ ६६ ॥

एवं संशोधनं वर्गं कुष्ठन्नेवौषधेषु च ॥६७॥

कुर्यात्तेलानि सर्पापि प्रदेहोद्बर्षणानि च।

इसी प्रकार संशोधन वर्ग तथा कुष्ठन्नेव औषधियों में तैल, घृत सिद्ध करे। इन औषधियों से प्रदेह और उद्बर्षण करे।

वक्तव्य—संशोधनवर्ग—संशोधन संशमनीयाध्यायोक्त।

कुष्ठन्नेव—‘खदिरामयामलकहदिराककरसप्तपर्णारवधकरवीरवि-वंगजातिप्रवाला इति दशेमानि कुष्ठन्नानि भवन्ति ॥’ चरक ॥

प्रातः प्रातश्च सेवेत योगान वैरेचनान् शुभान्।

पंच षट् सप्त चाष्टौ वा यैरुत्थानं न गच्छति ॥६८॥

प्रतिदिन प्रातःकाल विरेचक योगों का सेवन करे, जिससे पाँच, छः, सात या आठ बार मल त्याग करे। अथवा पाँच, छः, सात, आठ दिन बाद विरेचन ले, जिससे दोष प्रकोप न हो। (डल्हण ने यहाँ पर कोई अर्थ नहीं दिया) ॥ ६८ ॥

कारभं वा पिवेन्मूत्रं जीर्णं तत्क्षीरभोजनम्।

धातसत्त्वानि कुष्ठानि मासैः पञ्चभिरोपेहित ॥६९॥

अथवा ऊँट का मूत्र पीये, इसके पचने पर ऊँटनी के दूध का भोजन करे। इस प्रकार छः मास करने पर कोई पड़ा कुष्ठ भी नष्ट हो जाता है। मूत्र-ऊँट का लेना चाहिये, क्योंकि—

“भोऽजाविमहिषीणान्तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते।

खरोष्ट्रेमनराश्चानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम्” ॥६९॥

दिष्टन्तुर्नन्तं कुष्ठस्य खदिरं कुष्ठपीडितः।

सर्वथैव प्रयुंजीत स्नानपानाशनादिषु ॥७०॥

यथा हन्ति प्रवृद्धत्वात् कुष्ठमातुरभोजसा।

तथा हन्त्युपयुक्तस्तु खदिरः कुष्ठभोजसा ॥७१॥

कुष्ठ से पीडित मनुष्य कुष्ठरोग को नष्ट करने के लिए खैरका स्नान, पान-भोजन आदि सब कार्यों में सम्पूर्ण रूप से उपयोग करे। जिस प्रकार कि बढ़ा होने से कुष्ठ अपने तेज से रोगी को मार देता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण रूप में बरता खैर अपनी शक्ति से कुष्ठ, को नष्ट कर देता है ॥ ७०, ७१ ॥

नीचरोमनखः श्रान्तो हितार्यौषधतत्परः।

योपिन्मांससुरावर्जौ कृष्टौ कुष्ठमपोहति ॥७२॥

कुष्ठ रोगी—बाल और नख कटवाकर, आराम करके हितकारी भोजन एवं औषध का सेवन निरन्तर करके, स्त्री-मांस-सुरा से अलग रहकर कुष्ठ मुक्त हो जाता है।

(‘श्रान्तः’ के स्थान पर ‘अश्रान्तः’ पाठ ठीक है—आराम ले, अथवा श्रान्तः पाठ रखने में जितेन्द्रिय, रोगी वासना से रहित यह अर्थ करना होगा।)

वि० मन्तव्य—श्रान्त पाठ इस दृष्टि से समीचीन है कि श्रम से स्वेद की प्रवृत्ति होकर और आहार पाचन होकर शरीर निर्दोष हो जाता है। और नूतन दोष बढ़ने या सन्निध नहीं होने पाते ॥ ७२ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने कुष्ठचिकित्संतं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥

दशमोऽध्यायः

अथातो महाकुष्ठचिकित्संतं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके आगे महाकुष्ठ चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १, २ ॥

कुष्ठेषु मेहेषु कृफामयेषु

सर्वांगशोफेषु च दारुणेषु।