सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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ही चिकित्सक निर्णय करता है, इसलिये जो समय पर ठीक हो वह करे।
वि० मन्तव्य—उक्त दो मूढगमों में शस्त्रकर्म करना इसलिये विहित है, कि किसी प्रकार गर्भिणी के प्राण बचाए जायें, परन्तु जीवित गर्भ पर शस्त्र द्वारा कर्म करना भी उचित नहीं है अन्यथा वह तड़पकर अपने को और गर्भिणी को मार डालता है, इस दशा में आज कल तो उदर तथा गर्भाशय चीरकर जीवित गर्भ निकाल लिया जाता है। इस विषय पर वर्तमान सुश्रुत में जो आपके हाथों में हैं, कोई विधान नहीं मिलता है, परन्तु हमारा विश्वास है कि वह विधान अवश्य रहा होगा। भगवान् धन्वन्तरि ने अवश्य कहा होगा। कारण? कारण सुनिचे—उक्त पाठ में कहा है, कि दो प्रकार के मूढ गर्भ असाध्य अर्थात् हाथ से निकालने योग्य नहीं होते और सूचेत-जीवित गर्भ पर शस्त्र कर्म करके निकालने का भी निषेध किया है, इस दशा में यदि उक्त प्रकार के दोनों मूढगर्भ जीवित हों तो क्या किया जाय? यह एक विचारणीय विषय है, अतः हमारा दृढ़ विश्वास है, कि उदर एवं गर्भाशय चीरकर गर्भ निकालने का विधान भगवान् धन्वन्तरि ने अवश्य किया होगा। भले ही वह विधानात्मक पाठ आज के सुश्रुत में नहीं है। अरमरी तथा गर्भ एक ही प्रकार से निकाले जाते हैं। सूते च—मृत ही नहीं जीवित मूढ गर्भ भी इसी विधि से निकाले जाते हैं, परन्तु शस्त्र कर्म मृत पर ही किया जाता है। यदि कोई ऐसा रोग हो जाय जो गर्भपात होने पर शान्त हो सकता हो अन्यथा गर्भिणी की मृत्यु निश्चित हो तब गर्भपातन ही कर देना चाहिये, जिससे नारी के प्राण बच जायें ॥६-११॥
ततः क्षियमाश्वत्स्य मण्डलाग्नेषाङ्गुलीशङ्खेण वा शिरो विदार्य, शिरःकपालान्याहृत्य, शङ्कुना गृहीत्वा रसि कक्षायां वाऽपहरेत्; अभिन्नशिरसमक्षिकृते गण्डे वा, असंसक्तसंस्थासदृशे बाहु छिन्त्वा, हृतिमिवार्ततं वातपूर्णादरं वा विदार्य निरस्थान्नाणि शिशिलीभूतमाहरेत्, जघनसक्तस्य वा जघनकपालानीति ॥१२॥
फिर स्त्री को आश्वत्सन देकर, मण्डलाग्ना या अंगुली शस्त्र से शिर का विदारण करके, शिर की अस्थियों को निकालकर, शंकु से छाती, या कक्षा में फँसाकर बच्चे को खींच ले। शिर के न टूटने पर अक्षिकृत या गण्ड में शंकु को फँसाकर खींचे। अंगों से फँसे गर्भ में कन्चे पर से बाहु को काटकर निकाले। मशक की तरह वायु से भरने के कारण फूले हुए उदर को चीरकर, आंतों को निकालकर, ढीला हो जाने पर निकाले। नितम्ब से फँसे गर्भ में जघन कपालों को काटकर बाहर निकाले।
वि० मन्तव्य—यह उन अन्त के दो असाध्यमूढ गर्भों को काटकर निकालने का विधान है ॥१२॥
क्रिबहुना—यद्यदङ्गं हि गर्भस्य तस्य सज्जनति तद्विषक्। सस्यविनिर्हरेच्छिन्त्वा रक्षेत्रात्री च यन्ततः ॥१३॥ गर्भस्य गतयश्चिन्ना जायन्तेऽनिलकोपतः। तद्धानल्पमतिर्वेद्यो वर्तते विधिपूर्वकम् ॥१४॥ नोपेक्षेत मृतं गर्भं मुहूर्तमपि पण्डितः। स ह्यागु जननीं हन्ति निरुच्छ्वासं पश्यं यथा ॥१५॥ मण्डलाग्ने कर्तव्यं छेद्यमन्तर्विजानता। वृद्धिपञ्चं हि तीक्ष्णार्थं नारी हिंस्यात् कदाचन ॥१६॥ अथापतन्तीमपरां पातयेत् पूर्ववद्विषक्। हस्तेनापहरेद्वाऽपि पार्श्वोभ्यां परिपीड्य वा ॥१७॥ ध्रुतुयाच्च मुहुनोरीं पीडयेद्वाऽसपिण्डिकाम्। तैलाक्त्योनेरेवं तां पातयेन्मतिमान् भिषक् ॥१८॥ एवं निहृतशल्यां तु सिञ्चेद्बुध्णेन वारिणा। ततोऽभ्यक्तशरीराया योनीं स्नेहं निधापयेत् ॥१९॥ एवं मुद्गी भवेद्योनिस्तच्छूलं चोपशाम्यति। गर्भं का जो-जो अंग रुकता हो, वह उस अंग को काटकर निकाले। गर्भिणी की रक्षा सब उपायों से करे। वायु के प्रकोप से गर्भ की गतियाँ नाना प्रकार की होती हैं। इनमें पशुरबुद्धिवाला वैद्य विधिपूर्वक बरते। मरे हुये गर्भ की एक क्षण भी उपेक्षा न करे। यह मृत गर्भ माता को मार देता है, जिस प्रकार कि गला घोटने पर पशु तुरन्त मर जाता है। जाननेवाला वैद्य अन्दर शस्त्रकर्म मण्डलाग्ना से करे, क्योंकि शायद कभी वृद्धि पत्र से माता को हानि होना सम्भव है। इसके पीछे न निकली अपरा को वैद्य निकाले। यदि हाथों से बाहर न निकाली जा सके, तो पार्श्वों को दबाकर निकाले। नारी को बार-बार झकोरे, अथवा असपिण्डिका को दबाये। तैल से योनि को स्निग्ध करे, इस प्रकार से वैद्य अपरा को निकाले। यदि इस प्रकार अपरा के बाहर आ जाने पर गरम पानी से स्नान कराये। फिर शरीर पर तैलाभ्यां करके योनि में तैल रक्खे। इस प्रकार करने से योनि को मल होती है, और शूल शान्त हो जाती है ॥१३-१९॥
कृष्णातन्मूलशुण्टयेलाहिगुभार्गीः सदीप्यकाः ॥२०॥ वचामतिविषां रास्तां चतुर्णं संचूर्णं पाययेत्। स्नेहेन दोषस्यन्दाथं वेदोपशमाय च ॥२१॥ क्वाथं चैषां तथा कल्कं चूर्णां वा स्नेहवर्जितम्। शाकत्वगिहङ्गवृत्तिविषापाठाकटुक्रोहिणीः ॥२२॥ तथा तेजोवती चापि पाययेत् पूर्ववद् भिषक्। त्रिराडां पञ्चसप्ताहं ततः स्नेहं पुनः पिवेत् ॥२३॥ पाययेतासवं नक्तमरिष्टं वा सुमस्कृतम्। शिरोषककुभाभ्यां च तोयमाचमने हितम् ॥२४॥ उपद्रावश्च येऽन्ये स्थुस्तान् यथाश्वमुपाचरेत्। सर्गैतः परिमुद्गा च स्निग्धपथ्याल्पभोजना ॥२५॥