सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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एरण्ड के पत्त, मूल, छाल से अथवा कण्टकारी के मूढ से
सिद्ध किया बकरी का दूध, सुहाता इआ गरम-गरम सेक में
उत्तम है । आश्व्योतन में दूध को ठण्डा करके बरते ।११॥
सैन्धबोदीच्ययष्ठ याह पिप्परीभिः शतं पयः ॥१२॥।
हितमर्घोदकं सेके तथाऽऽच्योतनमेव च ।
सैन्धव, खस, सठेहढी, पिप्यली इनसे, आधा पानी मिलाया
दूष, शि करे । यह दुध परिषेक मै, उत्तम ह । (सेन्धव आदि
की मात्रा दृध, से अष्टमांश) \
हीबेरवक्रमञ्जिष्ठोदुम्बरत्वल्च साधितम् ॥१३॥ सास्भर्छ्ागं पयो वाऽपि शूलाश्च्योतनमुत्तमम् ।
बालक, तगर, मजीठ, गूर की छार इनसे आधा पानी मिलाया बकरी का दूध सिद्ध करे । यह आशश्च्योतन श्ल के
ल्य उत्तम हे । (उल्हण ने चार गुणा पानी मिलने को कहा
है) । १२ मधुकं रजनीं पथ्यां देवदार च पेषयेत् ।१४॥ आजेन पयसा श्रष्ठमभिष्यन्दे तद्ञ्जनम् ।
मुङेहटी, हल्दी, हरड़, देवदाच, इनको बकरी के दूष से
पीसखक्रर अिष्यन्द मे अजन करना उत्तम है ।,१४५॥
गेरिक सेन्धवं ष्णां नागरं च यथोत्तरम् ।(१५॥
दविगुणं पिष्टमदूभिस्तु गुटिकाञ्जनमिष्यते ।
गेरू से सेन्धव दुगुना, सैन्धव से पिप्य द्विगुण, पिप्पली
से सोंठ द्विगुण लेकर पानीके साथ पीकर गोखी बनाये
इसका अंजन करे | (कद बकरी के दुध मे पीसकर गोली
नाते है) ।१५॥
सनेहान्जनं हितं चा वद्धयते तद्यथाविधि ॥१६॥
विधिपूञक स्नेहांजन करना (अपतपण, सिरावेध आदि
करके). उत्तम कहते द । |
-वक्तव्य--^“ताग्रपाचस्थितं मासं सर्पिः सेन्धवसंयुतम्?-- इसको कोई स्ने्दाजन करते ह । दूसरे “वसा चानूप जलजा वेन्धवेन खमायुता इसको स्नेदांजन मानते है | १६॥ 7 . रोगो यञ्चान्यतोवातो यश्च सारुत्तपयंयः। _. अनेनैव विधानेन भिषक् तावपि साधयेत्॥१७॥ अन्यतोवात ओर वातप्यांय दन दौ रोगों कीभी वैच
इसी विधि से चिकित्सा करे १७॥ > पूवेभक्तं हितं सर्पिः क्षीरं वाऽप्यथ भोजने। अष्षादस्यां कपिर्थे च पच्चमूङे महत्यपि ॥९८॥ ˆ सक्षीरं ककटरसे सिद्धं चाश धृतं पिवेत् _ व & चिद्ध वा दितमनाह पत्तरातेगाग्निकेः ॥१९॥ सक्षीरं मेषश्रङ्गया बा सर्पिर्वरितरेण वा । | अन्यतो बातत, ओर वात्तपव्रय मे भोजन से-पश्ठे घृत पिटाये, या मोजन मे दू देवे । वन्दाक, केथ, विल्वादि महा- पृचमूढ, दूध, केकढ़े का मांसरख, इनसे विद्ध किया धृत पीये |
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सुश्चतसंहिता ः [ अश १७ अथवा मच्क्ली, आत्तगल (क्चिटी या सहचर), चिचक इरे
सिद्ध क्याधीःया मेष शरज्गी ओर दूष से अथवा बर (बखेल) ओर दूध से सिद्ध घृत पिकये ॥१८,१६॥ _ `
सेन्धवं दास् शुण्ठी च मातुदुङ्गरसो घृतम् ॥२०॥ स्तन्योदकाभ्यां कृतन्य शुष्केपाके तदञ्जनम् | पूजितं सपिषश्चात्र पानसदणोश् तपरणम् ॥२१॥ घृतेन जीवनीयेन नस्यं तेव्ेन चाणुना ।
परिषेके हितं चात्र पयः ओतं ससेन्धवम् ॥२२॥
रजनीदारुसिद्धं बा सैन्धवेन समायुतम् ।
सर्पियुतं स्यन्यघृष्ट मङ्धनं वा महौषधम् ॥२३॥
वसा वाऽऽनूपजलजा सेन्धवेन समायुता । नागरोन्मिभिता किद्िच्छुष्कपाके तदञ्जनम् ॥२४॥ सेन्धव, देवदार ओर सोंठ इनके कल्क से विजौरे के रख, घी, दूध, ओर पानी इन द्रवो मे रसक्रिया बनाकर शफ
पाक मं अंजन करना चाहिए ¦ घी का पान ओरषीकार्जवों | मे तपण करना उत्तम दै । जीवनीय घृतसे या अणुतैह से | नस्य देवे । सेन्धव मिभित ठण्डा दूध परिषेक मे उत्तमदै।
हल्दी, देवदारु, से सिद्ध दूष म थोड़ा नमक भिलाकर् परिक |
करे । साठ को दुध मे पिसकर- थोडा सा घौ सिलाक्र अंजन |
करे । भेख आदिः आनप, मछरी आदि जलज प्राणियों कौ वषा
सेन्धव ओर थोडी सी - सोंठ मिलाकर, शुष्क पाक मै अंजन
करना उत्तम है ॥२०-२४॥
पवनप्रभवा रोगा ये केचिदृटष्टिनाशनाः ।
बीजेनानेन मतिमान् तेषु कम प्रयोजयेत् ॥२५॥
वातजन्य जो रोग दृष्टि को नष्ट करते है, उन रोगो.
बुद्धिमान् इस बीजरूप चिकित्सा से कम करे । (दष्िनाशना~ ` |
तिमिरकाच आदि)।- | “उत्पन्नमात्रे तरुणे नेत्ररोगे बिडाक्कः | . ` | ¬ कार्यो दाह्ोपदेहाश्ु शोफरागनिवारणः॥ ~ : ~ 1
नागरं सन्धवं सर्षिः मण्डन च रसक्रिया -:- = - निधूष्टं बातिके < तद्वन्मधुसेन्धवगेरिकम् ॥ _ `
तथा शावरकं लोध्र धृतमृष्टं बिडार्कः
` तदूषत् काथो हरीतक्या धृतमृष्टो खजापहः 1 च° ॥९५।
= इति-शभीमुश्चतसंहितायामुत्तरत आन्तगते शालाक्यतत्तर
: . वाताभिष्यन्दग्रतिषेधो नाम नवमोऽध्यायः -।६॥
1 नि गसि
दशमोऽध्यायः |
. अथातः पित्ताभिष्यन्दभध्रतिषेधं ज्याख्यास्यामः॥। । |
यथोवाच भगवान् धन्बन्तरिः-॥२॥ ~ ` (
: अव्र सके आगे. पित्तामिष्यन्द रतिषेष का व्याल
करगे-जैसा मगवान् धन्वन्तरि ने कदा ा.॥ ९२२
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