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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४० ]

अन्तरन्तन्त्रम्

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है। क्योंकि इस रोग में विशेषता यही है कि-रोगी काँखता है, पुरीष निकालने के लिये शक्ति भर प्रयत्न करता है और उदर में भीषण विलोडन या एंटेन-आवी-प्रखवेदना के समान भीषण पीड़ा होती है। इसे पेचिस या आँव पड़ना कहते हैं। रोग में अतिसार के समान द्रव पुरीष का अतिसरण नहीं होता, अपितु पुरीष की हरङ्जैसी गांठें बंध जाती हैं, कभी र यह इतनी कड़ी होती हैं कि गुदवलयों में खरोश (परिकर्त्तिका) पड़ जाती है ॥१३८॥

प्रवाहिका वातकृता सशूला

पितात् सदाहा सकृपा कृफाच्छ च ।

सशोणिता शोणितसंभवा तु

ताः स्नेहर्लूक्षप्रभवा मतास्तु ॥१३९॥

तासामतौसाख्वादिशेन्च

लिङ्गं कर्म चामविपक्वतां च ।

वातजन्य प्रवाहिका में शूल होता है, पित्तजन्य में दाह, कृफजन्य में कृफ आता है, रक्तजन्य प्रवाहिका में रक्त आता है। ये प्रवाहिकायें स्नेह एवं रूक्ष कारणों से उत्पन्न होती हैं। इन प्रवाहिकाओं में वातादि के लक्षण, आम एवं पक्प्रवाहिका के लक्षण, चिकित्सा अतीसार की भांति जानो ॥१३९॥

न शान्तिमायाति विल्वघनैर्यो

योगैरुदीर्णा यदि पाचनैर्वा ॥१४०॥

ता क्षीरमेवाशु श्रुतं निहन्ति

तैलं तिलः पिच्छिलवस्तयश्च ।

उक्तप्रवाहिका जो लंघन एवं पाचन योगों से भी शान्त नहीं होती, उसको गरम किया दूध शीघ्र शान्त कर देता है या तैल, पिच्छिल वस्तियाँ नष्ट कर देती हैं ॥१४०॥

आद्रेः कुरौः संपरिवेष्टितानि

वृन्तान्यथाद्रीणि हि शाल्मलीनाम् ॥१४१॥

पक्वानि सम्यक् पुटपाकयोगे-

नापोध्य तेभ्यो रसमाद्वीत ।

क्षीरं श्रुतं तैलहर्विर्विमिश्रं

करकेन यद्योमधुकरस्य वाऽपि ॥१४२॥

वस्ति विदध्याद्विषगप्रमत्तः

प्रवाहिकामूत्रपुरीषसङ्गे ।

प्रवाहिका में मूत्र और मल का अवरोध होने पर सिम्बल के गीले हरे-कोपलों को गीली कुशाओं से लपेटकर ऊपर मिट्टी का लेप करके पुटपाक विधिसे भली प्रकार पकाये। फिर इनको कूटकर इनका रस निकाल ले। इसमें गरम किया दूध, तैल, घी और मुलेहठी का कल्क मिलाकर वैद्य बिना आलस्य हुए वस्ति देता रहे। ( अप्रमत्तः सावधानः ) ।

वि० मन्तव्य—यदि वस्ति देने की व्यवस्था न हो तो इस योग को पिछा दिया जाय ॥१४१, १४२॥

द्विपक्षमूलोक्वथितेन शूले

प्रवाहमाणस्य समाश्रिकेण ॥१४३॥

क्षीरेण चास्थापनमग्रयमुक्तं

प्रवाहण में शूल होने पर दशमूल के क्वाथ से सिद्ध किये दूध में मधु मिलाकर आस्थापन वस्ति देना उत्तम है ॥१४३॥ तैलेन युज्यादनुवासनं च ।

दशमूल से सिद्ध दूध से तैल से सिद्ध करके अनुवासन देवे। ( अपक तैल से अनुवासन न देवे ) ।

वातघ्नवर्गं लवणेषु चैव

तैलं च सिद्धं हितमन्तपाने ॥१४४॥

विदारीगन्धादि वातघ्न द्रव्यों से तथा सैन्धवादि नमकों से सिद्ध तैल खान पान में बरतना उत्तम है।

वि० मन्तव्य—असिद्ध तैल भी पिलाया जाता है, तर्क में मिलाकर अथवा तैल में मालपूआ बनाकर भरपेट खिलाया जाता है ॥१४४॥

लोभं विडं विल्वशलादु चैव

लिह्यान्च तैलेन कटुत्रिकाक्षम् ।

लोध, विडनमक, कच्चे विल्व, त्रिकटु ( प्रचुर मात्रा में ) मिलाकर तैल से चाटे ।

दध्ना ससारेण समाश्रिकेण

मुञ्जीत निश्चा ( सा ) रकपीडितस्तु ॥१४५॥

सुतप्रकृप्यक्वथितेन वाऽपि

क्षीरेण शीतेन मधुप्लुतेन ।

शूलादितो ऽयोषविदारीगन्धा-

सिद्धेन दुग्धेन हिताय भोज्या ॥१४६॥

वातघ्नसाम्राहिकदीपनीरैः

कृतान् षडांश्राप्नुपभोजयेन्च ।

खादेरुचं मत्स्यान् रसमानुयाच्छ

वातघ्नसिद्धं सघृतं सतैलम् ॥१४७॥

पूणांन्यजानां तु वटप्रवालैः

सिद्धानि साधं पिशितानि खादेत् ।

मेध्य ( य ) स्य सिद्धं स्वयवाऽपि रक्तं

वस्तस्य दध्ना घृततैलयुक्तम् ॥१४८॥

खादेत् प्रदेहेः शिखिलावजैर्वा

मुञ्जीत यूपैर्दधिभिश्च मुख्यैः ।

माषान् सुसिद्धान् घृतमण्डयुक्तान्

खादेरुचं दध्ना मरिचोपदंशम् ॥१४९॥

निश्चारक रोग से पीड़ित मनुष्य मलाई युक्त दही में मधु मिलाकर उसके साथ भोजन करे। अथवा सोने को ( अर्धटित स्वर्ण ) गरम करके, इससे गरम किये ( उबाले ) दूध के ठण्डा होने पर मधु मिलाकर उसके साथ भोजन करे। शूल से पीड़ित-त्रिकटु, विदारीगन्धादिगण से सिद्ध दूध से हितकारी भोजन