सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कर ब्रिजौरे के स्वरस मँ शकरा मिलाकर पीये । अथवा
पृथ्वीका आदि के चूणं मे अनारदाना मिलाकर वस्ति ( वटी-
गोटी) वेय बनाये | यह वत्ति गुड़, तेल के साथ मिलाकर
चाटने या मद्य के साय पीने पर वातिक शख को शीघ्र नष्ट
करती हे ॥६५.६६॥।
बुभुक्षाप्रभवे गूढे छघु संतपणं हितम् ॥१००॥ उष्णैः क्षीरेयंवागूभिः स्निरधेमांसरसेस्तथा |
मूखजनित शु मे-ल्धु-हितकार सन्तपण भोजन उत्तम
हे । गरम दूध, गरम यवागू , स्निग्ध मांखरसों से भोजन देवे ॥
वातश्जङ़े ससुतपन्ने रुक्षं स्निग्धेन भोजयेत् ॥१०१॥
सुसंस्छृताः प्रदेयाः स्युघु तपूरा विशेषतः ।
वारुणीं च पिबेजन्तुस्तथा संपदयते सुखो ॥१०२॥।
एतद्वातसमुत्थस्य शृखस्योक्त चि किस्सितम् ।
बातशृल उल्यन्न होने पर रुक्च व्यक्ति को स्निग्ध वस्तुओं
का भोजन देवे । सोठ, मरिच आदि से सुसस्छृत धृत के पू
( घेवर ) विशेष सूप में देवे । रोगी वारुणी को पीये, इससे वह सुखी होता दै । वातजनित शुर की यह चिकिःा कह दी हे ॥
अथ पित्तसमुत्थस्य क्रियां वदयास्यतः परम् ॥१०३।
स सुखं छदेयित्वा तु पीत्वा गीतोदकं नरः।
शीतखानि च सेवेत सर्वाण्युष्णानि वजयेत् ॥१०४॥
इसके आगे पित्तजनित शल कौ चिकित्खा करहरंगा-पित्त- शृटी व्यक्ति शीतठ जल पीकर सुख पूवंक वमन करके शीत
वस्तुओं का सेवन करे, ओर उष्ण वस्तुओं को छोड़ देवे ॥
मणिराजतताम्राणि भाजनानि च सवेशः। - वारिपृणोनि तान्यस्य ूरस्योपरि निष्ठिपेत् ॥१०५॥
मणि, चांदी, ताम्र के सम्पूणं स्प में बने पात्रों को ` शीतल
जल से भरकर शुर के ऊपर रक्खे ॥१०५॥
गुडः शाच्यिंवाः क्षीरं सर्पिःपानं विरेचनम् । जांगखानि च मांसानि भेषजं पित्तञुङ्निाम् ॥१०६॥
रसान् सेवेत पित्तभ्नान् पित्तछानि विवजयेत्।
पालाश्चं धान्वनं वाऽपि पिवेदयपं सञ्जकंरम् ॥१०५७॥
पित्तशृटी रोगियों के व्यि. गुड़, शाछि धान्य, जो, दुध,
घुतपान, विरेचन, जांगल्मांख ओषध हँ । पित्तनाशक मार्घो के
रसो को लाये, पित्तकारक वस्तुओं का परित्याग करे । मांस
खानेवषि प्राणिर्यो के मखिकारस, या जंगल प्राणियोंका
मांसरस, शकरा के साथ पीये ॥१०६,१०७॥। पर्षकाणि भृद्रीकाखजुरोदकजान्यपि। `
तत् पिवच्छकरायुकतं पित्तशनिवारणम् ॥१०८॥
फाल्खा, मृद्वीका, खजुर, कमल आदि पानी के कन्द्-
इनको शकरा के खाय पीये, यहं पित्तशुल नाशक ई ॥१०८॥
युश्र्षसंहिता `
अञने मुक्तमात्रे तु प्रकीपः शरेष्मिकस्य च | वमनं कारयेत्तत्र पिप्पछोवारिणा भिषक् ॥१०६॥
भोजन के खाने के पीछे तरन्त ही कफजन्य त श्रू प्रकोप होता है, इसमे वद्य पिपली के पानी से वमन् का कराये | ( िप्यली मिश्रित पानी, पिप्यलो का क्वाय या मैनपल करौ | पिप्पली से वमन कराये ) ॥१०६॥
रुक्षः सवेदः प्रयोज्यः स्यादन्याश्ोष्णा क्रिया हिता, पिप्पडी शङ्गवेरं च इरष्मञुे भिषग्जितम् ॥१९०॥
कफजन्य शूल मेँ रूक् स्वेद वरते, उष्ण उपचार करे | पिप्यली ओर सोढ का प्रयोग क्वाथ कल्क, चूण विधि से कप.
जनित शुर मे चिकित्सा है ।॥११०॥
पाठां वचां चरिक्टुक तथा कटुकरोहिणीप् ।
चित्रकस्य च नियु हे पिबदषं सहाजकम् ॥ ११९१॥
पाठा, वच; त्रिकटु, कुटकौ, चित्रक, इनके क्वायथमे अथवा कुठेरक के साथ बनाया शिम्बी घान्य का यूष पीये ॥१११॥
एरण्डफलटमूलानि मूं गोह्धरकस्य च । आख्प्णीं प्रश्नपणीं बहतो कण्टका{रकाम् ॥११२॥
द्याच्छृगाङूविन्नां च सहदेवां तथेव च ।
महासदां द्रसह। मूखमिज्ुरकस्य च ॥१९३॥
एतत् संश्रय संभारं जख्द्रोणे विपाचयेत्।
चतुभोगावशेषं तु यवक्षारयुतं पिबेत् ॥११४॥
वातिक पैत्तिकं वाऽपि श्ेष्मिकं सान्निपातिकम् । प्रसद्य नाशयेच्छरूलं छिन्नाभ्रमिव मारुतः ॥११५॥
एरण्ड फल, एरण्डमूक, गोखस का मूक, शालपर्णी, प्रन
पर्णी, करेरी, बड़ीकटेरी, श्गाकविन्ना ( पृरिनिपर्णा ), सहदेव `
मुद्गपर्णी, माषपर्णी, तालमलाने का मूर, इन सव्रको एकत्रित
करके एकं द्रोण जल मे पकाये । चठर्थोश रहने पर इसमे य॒बक्षार मिलाकर पीये । यह नित्य ग्रति सेवन करने प्र वात्कि,
पत्तिक, कफज एवं सान्निपातिक शूर को बलात् नष्ट करता ९ ।
पिपी स्वर्जिकाक्षारो यवाधित्रक एव च ।
सेभ्यं सौतत् समानीय भस्म ऊयाद्विचक्षणः ॥११६॥
तदुष्णवारिणा पीतं इरेष्मर्ङं भिषग्जितम् ।
पिपली, सजंश्षार, जौ, चित्रक, खस, इन सका ध
करके बुद्धिमान् भस्म बनाये | इस मस्म कौ "गरम षन्
पीये, कफजनित शृ की चिकिस्वा है ॥११६॥
रुणद्धि मारत श्टेषमा कुक्षिपावेभ्यवस्थितः ॥१९.
स संरुद्धः करोत्याशु साध्मानं गुडयुडायनम्- ।
सूचीभिरिव निस्तोदं छच्छोच्छबासी तदा नरः
नान्नं वाञ्छति नो निद्रा्ुैव्यविनिपीडितः । ह
पाङवेशलः <। विज्ञेयः कफानिकससदू भव ॥१९
पाश्वं शुर-डुश्षि पाश्वं 3 कफव
देता दै। यष्ट्का वायु शीघदी जभान फ
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| रोक चै स्थित कफर वायु क