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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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वि° मन्तव्य-यरं दंदयका शल है इसमे कफ,

रस = रक्तमिश्रित रस तथा वायु चारों कुपित-विङकृत होते हे ।

इसका प्रभाव पुफरुसो पर भी पड़ता है, अतः श्वास मे अव￾रोध होने लगता हे ॥१३१,१२२॥

तत्रापि कमौमिहितं यदुक्तं हद्विकारिणाम्‌ |

इसमें हृद्रोग में कदी चिकित्सा बरतनी चाये ।

संरोधात्‌ कुपितो वायुबेस्तिमाब्ुव्य तिष्ठति ॥१३३॥ वस्तिवङ्क्षणनाभीषु ततः शरोऽस्य जायते । विणमूत्रवातसंोधी बस्तिशञ॒खः स मारुतात्‌ ॥१३४।।

मूत्र-मरू के रोने से कुपित वायु वस्ति को घेरकर रक जाती है, इससे वस्ति, वक्षण ओर नामि में रोगीकौ शृ

होता है 1 इसमे मल वायु मूत्र सक जाती हे, इसको वस्ति

शु कहते है, यह वायुजन्य हे ।

वि° मन्तव्य-- वस्ति शृर-इसक्रा प्रभाव समस्त मूत्र संस्थान पर पडता है | इसी का विवरण निम्नटिखित श्लोक

१३५ मे किया हे । मूत्र शल मू का नदीं अपितु मूत्र संस्थान का शृ हे ।|१६२,१२३४॥ नाभ्यां बङक्षणपाश्वषु ङुक्षौ मेदान्त्रमदेकः ।

मूत्रमादृव्य गृह्णाति मूत्रशः स मारुतात्‌ ॥१६९५॥ जव मेहन ओर अति को पीड़ित करता हुआ वायु मूत्र को रोकं देता है, तव नामि वंक्षण, पाश्वं ओर श्चि मे शख

हता है । इसे मू शृल कहते है, यह शल वायु से होती है ॥

वायुः प्रकुपितो यस्य रक्षाहदारस्य देहिनः । मठं रुणद्धि कोष्ठस्थं मन्दीकृत्य तु पावकम्‌ ॥१३६॥ गं संजनयस्तीत्रं सरोतांस्याधरत्य तस्य हि ।

दक्षिणं यदि वा वर्मं कुक्षिमादाय जायते ॥१३७॥ सवत्र वधते क्षिप्रं भरमन्नथ सघोषवान्‌ । पिपासा वधेते तीव्रा भमो मूच्छ च जायते ॥१३८॥ उच्चारितो मूत्रितश्च न आन्तिमधिगच्छति । विट्ूमेतजानीयाद्‌ भिषक्‌ परमदारुणम्‌ ॥१३९॥ पुरीषशूल-- रुक्च भोजन करनेवाले जिस पुष में प्रकुपित वायु मल को रोककर, कोष्ठस्थ अग्नि को मन्द्‌ करके, तथा लोतो को धेरकर तीव्रशृल दक्षिणाश्वं मे या वामपाश्वं ये उन्न करती ह (मछ को रोककर), उस पुरुष मे वायु शब्द के साय घूमती हु सम्पूणं उद्र में शीघ्र कैर जाती है । रोगौ म तीतर प्यास अद जाती है, भ्रम एवं मूर्छा होती ६ै। मल प्याग या भज त्याग करने पर भी शान्ति नहीं होती । इसको विदृशुल जाने, यह्‌ अतिकष्टदायक रै । बि° मन्तव्य--मलाशय का शृ है, मटा्य अर्थात्‌ बृहद्‌ अन्तर समस्त उद्र मर धूमा हभ रहता है, अतः उदर मे दाहिनी एवं बां ओर शूढ होता ै। पुरीष एं मूत्र तो

युश्रतसं हित | ०४

पुरीष एषं

बिटृशूर

शूरे |

जड़ हँ ओर शूल हौतां है सजीवे अवयव में । अतः मूत्र कात्याग दहो जाने पर भी शुरु बना रहता है । विट्‌ = पुरीष का शूढ नदीं, अपितु विट्‌ के आशय का क्षिप्रं दोषहरं कायं भिषजा साधु जानता | स्वेदनं समनं चेव निरूहाः स्नेह बस्तयः । १९०] पूर्वादिष्टान्‌ पाययेत योगान्‌ कोष्टविशोधकान्‌ | उदावतेहरांशचास्य क्रियाः सवः सुखावहाः ॥१४१॥ जाननेवाला वेद्य इसमे तुरन्त दोपहर करे | स्वेदन, शमनचिकित्सा, निरूह, एवं स्नेहवस्तियां देवे । पले कदे कोष्ठ शोधक योगो को पिये । इख रोगी मे उद्‌. वत्त नाशक, एवं सुखदायक सत्र उपचार करे ॥ १४८०१४१ अतिमात्रं यदा युक्तं पावके खरदुतां गते । स्थिरीभूतं तु तत्कोष्ठे वायुरावृत्य तिष्ठति ॥१४२] अविपाकगतं ह्यन्नं शरं तीव्रं करोत्यति । मूच्छोऽऽध्मानं वि दाहश्च हदुरक्टेशी विरम्बिका \ विरिच्यते छदेयति कम्पतेऽथ विद्यति । अविपाकाद्भवेच्छ्रूटस्स्वन्नदोषसमुद्भवः ॥१४४॥ अतिमात्रा मे खाया भोजन अग्निके मन्द्‌ हो जाने पर,

कोष्ठ मे जब स्थिर होकर वायु द्वारा धिसकर सुक जातारै,

तब न पका दुभा अन्न अत्यन्त तीव्र शुको अधिक मात्रा

मे उतयन्न करता है । इससे रोगी को मृच्छां, आध्मान, विदाहः हृदय मे बेचेनी, बिम्बिका होती है । वमन, विरेचन होता

हे; रोगी कपत दै, मूच्छित होता दै | यह शुरु अविपाकृपे उत्पन्न होता है, जो कि अन्नदोष के कारण से होता है । वि० मन्तव्य-- यह अजीण जनित श है । इसमे या तौ विलम्बिका होती है, जिसमे न छर्दि ही होती है ओर न अति-

सार ही । देखिये उ० अ० ५६ श्टोक ६। ओर या रि

वमन एवं विरेचन दोनों प्रार्भदहो जाते हं अथात्‌ वि

हो जाती है द° अ० ५६ श्छोक ६) ॥ १४२-१४४॥

वमनं छ्घनं स्वेदः पाचनं फर्वतयः। |

¦ । | क्षाराश्चणोनि गुटिकाः शस्यन्ते टखनाञनाः | १४९

^+

(शो धन) चिकिसा |

ज ? क्षार इसर्म-वमन) कषन, स्वेद, पाचन, फलवत्तित। 41 चूण, शूढनाशक शुचिका इख प्रशस्त द | १५५॥

गुर्मावस्थाः क्रियाः कायां यथावत्‌ सवंशूढिनाम्‌ ।

अवस्थानुखार सव शूर रोगियों मेँ गुल्म की अवसा

अनुखार चिकित्छा करनी चाहिये ।

वक्तव्य~कृफो वाते जितप्राये पित्तं शोणितमेव वे ।

यदि कुभ्यतिं वा तस्य क्रियमाणे चिकित्सिते ॥

यथोल्ब्रणस्थ दोषस्य तत्न कायं भिषग्जितम्‌ ।

आदावन्ते च मध्ये च मारुतं परिरश्चता ॥

वातयुल्मे कफो इद्धो ह्वाऽग्निमङचि य

०.५ । ॥ ङ,