सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 784, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 784

७२८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४४ ]

रोगी को प्रतीत होता है कि हृदय में सूहयों लुभ रही हैं अथवा हृदय चाकू से काटा जा रहा है और वह हृदय में खुजली तथा भीषण वेदना का अनुभव करता है। भगवान् पुनर्वसु कहते हैं कि इन लक्षणों से समझ लेना चाहिये कि यह रोग "कुमिज हृद्वरोग" है और इसकी त्रिकिंसा बहुत शीघ्र-कारी है अर्थात् थोड़ा विलम्ब होने पर कुमि हृदय को खा जाते हैं और फलतः मृत्यु हो जाती है ॥

कुमिजे कुमिजातीनां उल्लेखिकाणां च ये मताः ॥१०॥

वातोपसृष्टे हृदये वामयेत् स्निग्धमातुरम् ।

द्विपञ्चमूलकवायेन सस्नेहलवणं तु ॥११॥

पिप्पल्येलावचाहिङ्ग्यवभस्मानि सैन्धवम् ।

सौवर्चलमथो ङण्टोमजमोदां च चूर्णितम् ॥१२॥

फलधान्याम्लकौलथदधिमद्यासवादिभिः ।

पाययेत् विशुद्धं च स्नेहेनान्यतमेन वा ॥१३॥

वातज हृद्वरोग में—रोगी को स्नेहन देकर दशमूल के क्वाथ में स्नेह (घी) और नमक मिलाकर वमन करावे। फिर शोधन होने पर पिप्पली, इलायची, वच, हींग, यवक्षार, सैन्धव, सौवर्चल, सोंठ, अजवायन इनके चूर्ण को विजौरे आदि फलों के रस, कांजी, कुलथी का यूप, दही, मद्य, आसव, इनके साथ अथवा घी तैल-मञ्जा वसा इनमें से किसी एक स्नेह के साथ पिलाये। (तेल हृद्वरोग में उत्तम नहीं-ओज को कम करने के कारण) ॥१०-१३॥

भोजयेद्भोजनींशात्यन्तं जाङ्गलैः सघृतै रसैः ।

वातध्नसिद्धं तैलं च दद्याद्बस्ति प्रमाणतः ॥१४॥

भोजन में पुरातन शालीचावलों को घृत मिश्रित जांगल मांसरसों से देवे। मद्रदार्ब्यदि वातध्न द्रव्यों से सिद्ध तैल की बस्ति प्रमाण के अनुसार देवे ॥१४॥

श्रीपर्णीमधुकक्षौद्रसितोत्पलजलैर्वमेत् ।

पित्तोपसृष्टे हृदये सेवेत् मधुरैः श्रुतम् ॥१५॥

पित्त से उत्पन्न हृद्वरोग में—गम्भारी, मुलेहटी, मधु, शर्करा, कमल इनके पानी से रोगी को वमन कराये। काको-ल्यादि मधुर द्रव्यों से पकाया घृत पिलाये। पित्तव्वरनाशक के कषायों को (चन्दनोशीर श्रीपर्णी आदि) को पिलाये ॥

घृतं कषायार्थोद्दिशन् पित्तव्वरविनाशनान् ।

वृत्तस्य च रसेर्मुख्यैर्मधुरैः सघृतैर्भिषक् ॥१६॥

हरिण आदि के मुख्य मांसरसों को मधुर द्रव्यों से तथा घी से संस्कृत करके पर्याप्त मात्रा में वृत्ति पर्यन्त वैद्य पिलाये। मुलेहटी क्वाथ से सिद्ध तैल और मधु मिलाकर बस्ति देवे ॥

सक्षौद्रं वितरेद्बस्ती तैलं मधुकसाधितम् ।

वचानिम्बकषायार्थ्यां वान्तं हृदि कफात्मके ॥१७॥

चूर्णं तु पाययेतोकं वातजे भोजयेच्च तम् ।

फलादिमय मुस्तादि त्रिफलां वा पिवेत्ररः ॥१८॥

श्यामात्रिवृत्कल्कयुतं घृतं वाऽपि विरेचनम् ।

बलातैलैर्विदध्याच्च बस्ति बस्तिविशारदः ॥१९॥

कफजन्य हृद्वरोग में—वच, नीम के कषाय से वमन कराये। वातजहृद्वरोग में कहा चूर्ण (पिप्ली आदि का चूर्ण) पिलाये। वातज हृद्वरोग में कहा चूर्ण भोजन के साथ देवे। संशोधन में शमनीयुक्त मदनफलादि, द्रव्यसंग्रहणीयुक्त मुस्तादि, या त्रिफला को मनुष्य पीये। कालीनिशोथ निशोथकल्कमिश्रित घृत को विरेचन के लिये देवे। बस्ति को जाननेवाला बलातैल से बस्ति देवे ॥१७-१९॥

कुमिहृद्वरोगिणं स्निग्धं भोजयेत् पिशितौदनम् ।

दध्ना च पल्लोपेतं व्यहं पश्चाद्विरेचयेत् ॥२०॥

सुगन्धिभिः सलवणैर्योगैः साजाजिशर्करैः ।

विडङ्गगाढं धान्याम्लं पाययेताप्यनन्तरम् ॥२१॥

हृदयस्थाः पतन्त्येवमधस्तात् क्रमयो नृणाम् ।

यत्रात्रं वितरेच्छास्य सविडङ्गमतः परम् ॥२२॥

कुमिजन्य हृद्वरोगी को घृत से स्निग्ध पिशितौदन (मांस भोजन) को दही एवं तिल कल्क के साथ तीन दिन खिलाये। इसके पीछे सुगन्धित, लवणयुक्त, जीरा एवं शर्करा युक्त विरेचनों से विरेचन देवे। विरेचन के पीछे कांजी से विरेचन देवे। विरेचन के पीछे कांजी में प्रचुर विडंगचूर्ण मिलाकर इसको पिलाये। इस प्रकार करने से मनुष्यों के हृदयस्थ कुमि नीचे गिरते हैं। इसके बाद विडंग मिश्रित जो का अब उसे खाने को देवे।

वक्तव्यं—सुगन्धियोगैः—विरेचनकल्पोक्त "शर्कराक्षौद्र

संयुक्तं इत्यादि, सलवणयोगैः समा त्रिवृन्नागरकाभयाः" इत्यादि, अजाजी शर्करा मिश्रित लवणों से विरेचन देवे। चरक में— "भुक्तेऽधिकं जीर्यति शूलमहं जीणे स्थितं चेत् सुरदाह कुष्ठम्। सतित्वक् द्वे लवणे विडंगमुष्णाम्बुना सातिदिषं पिवेत्सा ॥ जीणेऽधिके स्नेहविरेचनं स्यात् फलैर्विरेच्यो यदि जीर्यति स्यात्। त्रिग्वेव कालेप्यधिके तु शूलं तीक्ष्णं हितं मूलविरेचनं स्यात् ॥ प्रायोऽनिलो रुदगतिः प्रकृत्यस्यामाशये शोधनमेव तस्मात्। कार्यं तथा लंघनपाचनं च सर्वं कुमिन् कुमिहृदग्देव" ॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे हृद्वरोगप्रतिषेधो नाम (पञ्चमोऽध्यायः, आदितः) त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४३॥

चतुश्चत्वारिंशतमोऽध्यायः

अथातः पाण्डुरोगप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥