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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० ५३ ]

जन्म कास नष्ट होते हैं । शतावरी, नागबला से घृत सिद्ध करना चाहिये, यह घृत कास रोगियों को देना चाहिये ।

वक्तव्य—कई आचार्य कुलीर आदि का क्वाथ (मांसरस) करके इस में मधुर वर्ग का कल्क मिलाकर घृत सिद्ध करना कहते हैं ॥४७॥

इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे कासप्रतिषेधो नाम ( चतुर्दशोऽध्यायः, आदितः ) द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५२॥

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अथातः स्वरभेदप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे स्वरभेदप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१, २॥

अत्युच्छ्वाषाणविषाध्ययनातिगीत-

शीतादिभिः प्रकृपिताः पवनादयस्तु ।

स्रोतःसु ते स्वरवहेषु गताः प्रतिष्ठां

हन्तुः स्वरं भवति चापि हि षड्विधः सः ॥३॥

बहुत ऊँचा बोलने से, विष से, बहुत गाने से, शीत आदि कारणों से वातादि कुपित होकर स्वरवह स्रोतों में पहुँचकर स्वर को बिठा देते हैं, यह स्वरभेद छै प्रकार का है ।

वक्तव्य—छै प्रकार का—वातादि दोषों से तीन प्रकार का, सन्निपात से, भेद दोष से और क्षयजन्य (जैसा कैन्सर रोग में) होता है । भेद क्षयजन्य स्वर भेद—थाई रीयड् प्रन्थि के रोग में मिलता है । चरक में वातात् पित्ताल्कफाद् रक्तात् कासवेगात् सपीनसात्—इस प्रकार से छ प्रकार का माना है । दोनों में यह भेद शल्यदृष्टि और काय चिकित्सा की दृष्टि से किया है । जैसा कि चरक में—मेत्ता हि मेथमन्यथा भिनन्ति, अन्यथा पुरस्ताद् मिच्छं भेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्दन् भेदसंख्याविशेषमापादयति अनेकधा, न च पूर्व भेदाग्रमुपहन्ति ॥ चरक वि० अ० ६—४ ।

वि० मन्तव्य—स्रोतस्तु ते स्वरवहेषु—सु० शा० अ० ६ में 'द्वाम्भ्यां भाषते, द्वाम्भ्यां घोषं करोति' कहते हुए भगवान् धन्वन्तरि ने जिन ४ धमनियों का उल्लेख किया है उन्हीं को यहाँ स्वरवह स्रोतसु कहा गया है । स्वरभेद में स्वर एवं व्यञ्जन का उच्चारण करने में विकृति आ जाती है । भाषते—भाषण वह है जिसमें व्यञ्जनों का उच्चारण होता है । भाष व्यक्तार्थ वाचि धातु भ्वादि गणीय से भाषा शब्द की निष्पत्ति होती है और जिसमें केवल शब्द-स्वर का उच्चारण होता है वह घोष कहलाता है । घुषिरू विशदने धातु है ॥३॥

वातेन कृष्णनयनाननमूत्रवर्च

भिन्नं शनैर्वदति गद्गदवत् स्वरं च ।

वायु के कारण उत्पन्न स्वर भेद में रोगी की आँख, मूत्र और मल काले हो जाते हैं । इसका स्वर फटा हुआ, धीमा, गद्गद (भर्राया हुआ) होता है । "स्वरभेदो भवेद् वातात् रुक्षःक्षामबलः स्वरः ॥" चरक ।

पित्तेन पीतवदनाक्षि पुरोषमूत्रो

ब्रूयाद्गलेन परिदाहसमन्वितेन ॥४॥

पित्तजनित स्वर भेद में रोगी को मुख, आँख, मल, मूत्र पीले हो जाते हैं, रोगी दाहयुक्त कण्ठ से बोलता है, रोगी का बोलते समय गले में जलन होती है । "तालुक्कण्ठपरिदाहः पित्ताद् वक्त्रमसूयते ॥" चरक ॥४॥

कृच्छ्रात् कफेन सततं कफशुद्धकण्ठो

मन्दं शनैर्वदति चापि दिवा विशेषः ।

कफ के कारण कठिनाई से बोलता है, निरन्तर कफ से गला रुका रहता है । रोगी दिन में धीमे और धीरे से बोलता है । (रात में शीत के कारण आवाज नहीं निकलती) ।

"कफान्मन्दो विबद्धश्च स्वरः खुरखुरायते" । चरक ।

सर्वात्मके भवति सर्वविकारसंप-

दन्त्यक्ता च वचसस्तमसाध्यमाहुः ॥५॥

सन्निपातजन्य स्वरभेद में सब दोषों के लक्षण रहते हैं । वाणी अस्पष्ट रहती है, इसको असाध्य कहते हैं ॥५॥

धूप्येत वाक् क्षयकृते क्षयमाप्नुयाच्छ्वा

वागेष चा (वा) पि हृतवाक् परिवर्जनीयः ।

क्षयजन्य स्वर भेद में वाणी में धूँवा-सा प्रतीत होता है, वाणी निरन्तर क्षीण होती जाती है । वाणी बन्द हो जाने पर यह असाध्य होता है ।

अन्तर्गलं स्वरमलद्वयपदं चिरेण

मेदक्षयाद्बदति दिग्धगलौष्ठतालुः ॥६॥

क्षीणस्य वृद्धस्य कन्नस्य चापि

चिरोतिथ्यो यश्च सहोपजातः ।

मेदस्त्रिनः सर्वसमुद्भवश्च

स्वरामयो यो न स सिद्धिमेति ॥७॥

मेद के क्षय से उत्पन्न स्वर भेद में स्वर गले के अन्दर ही रहता है, (बाहर नहीं आता), वाणी अस्पष्ट रहती है देर में बोलता है, गला, ओष्ठ, तालु मेद से लिप्त रहता है । क्षीण, वृद्ध, कृश व्यक्ति में त्रिरकालीन स्वरभेद, सहज (जन्मजात) स्वरभेद, मेदस्त्रिपुरुष का सन्निपातजन्य स्वरभेद ठीक नहीं होते ॥

स्निग्धान् स्वरानुरनरानपकृष्टदोषान्

न्यायेन तान् वमननेचनबस्तिभिश्च ।

नस्यावपीडमुखावान्धूमलेहैः

संपादयेच्च विविधैः कवलमहैश्च ॥८॥

स्वरभेद रोगियों को स्निग्ध करके यथाविधि से