सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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जल्दी चल्ने या परिध्रम से उत्पन्न श्वास को रोकने
हृदयरोग, मोह अथवा गुल्म उत्पन्न ह्येता है । जम्भाऽङ्गमर्दोङ्गशिरोक्षिजाञ्यं
। निद्रामिघातादथवाऽपि तन्द्रा ॥१७॥ निद्रा के उपस्थित वेग को रोकने से-जम्भा, अंगम अंग-शिर.आंख मे जडता (भारीपन) ओर तन्द्रां होती दै ॥१७ तृष्णार्दितं परिक्छिश् क्षीणं शखेरमिद्भुतम् | जज्ृदटमन्तं मतिमानुदावर्तिनयुरछजेत् ॥१८॥ तृष्णा से पीड़ित, अतिशय शिथिल (क्रिया रदित), क्षीण, शल से पीड़ित, मल का वमन करनेवाङे, उदावतं रोगी की बुद्धिमान् चिकित्षा न करे ॥१८।
सवेष्वेतेषु विधिवदुदावतंषु कृत्नशः ।
वायोः क्रिया विधातव्याः स्वमागेग्रतिपत्तये ॥१€॥ सामान्यतः प्रथक्त्वेन क्रियां भूयो निबोध मे । इन स्र उदावतां य वातव्याधि की सम्पूणं चिकित्सा (स्नेह, स्वेद आदि) विधिपूवक करनी चाहिये, जिससे वायु अपने
मागं में प्रबृत्त हो जाये । यह क्रिया खामान्यरूप मे सबके ल्ि है, पथक् प्रथक् रूप मे आगे सुनो ॥१६॥
आस्थापनं मारुतजे स्निग्धस्विन्ने विशिष्यते ॥२०
रोगी को स्नेहन ओर स्वेदन देकर वातहर द्रव्यो से बनाया आस्थापन (निरूह) वातोदावतं म करे ॥२०॥ पुरीषजे तु कतेभ्यो बिधिरानाहिको भवेत्। पुरीषजन्य उदावत मेँ आनाह चिकित्वा (फल्वक्ति आदि,
वातव्याधि में कदी चिकित्सा) करे ।
सौवच्राव्यां मदिरां मूते स्वभिहते पिवेत् ॥२१॥ एडां वाऽप्यथ मयेन क्षीरं वाऽपि पिबेन्नरः । धात्रीफलानां स्वरसं सजलं वा पिबेरयहम् ॥२२॥ रसमश्चपुरीषस्य गदेभस्याथवा पिबेत्।
मांसोपदंशं मधु वा पिबेद्वा सीधु गोडिकम् ॥२३॥ भद्रदाह घन मवा हरिद्रा मधुकं तथा] कोढप्रम।णानि पिवेदान्तरिक्तेण वारिणा ॥२४॥ दुःसखञासरसं वाऽपि कषायं ऊुङ्कमस्य च । एवरुबीजं तोयेन पिवेद!ऽरुवणीकृतम् ॥२५॥ पच्चमटीन्छत क्षीरं द्राक्षारसमथापि वा । मूतरजन्य उदावत मे प्रमूत सौवच॑ल नमक मिलाकर मदिरा को पीये । इलायची को मय के साथ पीये या दूष षीये। अथवा जछ क साथ आंवठे का सखरख तीन दिन पीये। घोडे की या गघेकी लीद का स्वरख पीये | मांख मक्षण के साय मधु मद्य; खी या गोडिकमयय (गुड़ से बना) पीये । देवद्[र, मस्ता मूवा, ह्दी, सु्ड्टी, इनको आघा कं लेकर वर्षां जल कँ साथ
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पीये। धमासेका स्वरस (अभाव में क्वाथ) या केसर = = ट क = शा कषाय, नि. | ¢ ककी-लीरे के बीज इनको योद से नमक मिभित |
अव् = श ति
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ुश्रतसंहिता [ ० ५४ जल के साय पीये । ल्धुप॑चमूर से सिद्ध क्षिया दूष या द्राक्षा रष पीये ( पचमूर लधु लेना लघुना पंचमूलेन श्तं श्रं
पिबेन्नरः?) |
वक्तव्य-मधु-यहां पर मय के ल्द, जैसा कि यद्या रोग मँ चरक में-“श्रसन्नां वारणं शौधुमरिष्टानाखवान्मधु |
स्वेदावगाहनाभ्यंगान् सर्पिषश्चावपीडकम् । मूतर प्रतिहते कुर्यात्
त्रिविधं बसितिमं च” | चरक सू० अ० ६ ॥२१-२५॥
योगांश्च वितरेदत्र पूर्बोक्तानङसरीभिदः ॥२६॥
म् तरकृच्छुक्रम चापि कुयोन्निरवरेषतः । भूयो वद्यामि योगान् यान् मूत्राघातोपशान्तये ।२७। मूत्रजन्य उदावत म अश्मरीको भेदन करनेवाञे योग
व्रते । मूरङ्च्छु की चिकित्छा सम्पूणरूप मेँ करे । मूत्राघात
को शान्तिके ल्यिअगेमी योर्गोको कहूुगा। उनको भी
यहां पर बरते ॥२६,२७॥ रनेदैः स्वेदेरुदावतं जस्भाजं समुपाचरेत् ।
जम्भाजन्य उदग्वत मे स्नेहन ओर सदन करे ।
अश्रुमोद्ोऽश्रज कायैः स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः ॥श्द
अश्रुजन्य उदावत मे रोगी को स्नेहन स्वेदन देकर
आंुओं का निःखारण करना चाहिये ॥२८॥
तीच्ाज्ञनावपीडाभ्यां तीच्णगन्योपशिङ्कनेः।
वर्तिप्रयोगैरथवा क्षुव सक्ति प्रवतयेत् ॥२९॥
(तीच्णोषधप्रधभनेरथवाऽऽदित्यरशिमिभिः।)
खक दई छींक को तीण अंजन, तीण अवपीडन, तीचणगन्ध (मरिचादि) आदिको सूषकर नाक मे वरसि डाल्कर,
प्रत्त करे । (तीद्ण ओषधिर्यो को नाक म फएूंककृर अथवा
सूयं की किरणों को देखकर छींक को प्रहत करे) ॥ २६॥ उद्गारजे क्रमोपेतं स्नैहिकं धूममा चरेत् ॥३०॥
सुरां सोव चंल्वतीं बीजपूररसान्विताम् । उद्गारजन्य उदावतं म धूम, नस्य, कवलग्रह बिधि से
स्नेहिक धूम बरते । सौवचंल ओर बिजौरे के रख से मिली छरा
को पीये |॥ २३०
छयोघातं यथादोषं सम्यक स्नेदादिभिजंयेत् ॥३१॥ सक्षारख्वणोपेतमभ्यज्गं चात्र दापयेत् ।
छदि के उदावत में दोषों के अनुखार भी प्रकार स्नेादि
विधि करे | यवक्षार ओर ख्वण से परिभित अभ्यंगमे धृत का
उपयोग करना उत्तम है, तैठ मी कुछ बरतते ह ॥२१॥
बस्तिश्ुद्धिकराापं चतुगुंणजढं पयः ॥२२॥
आव्रारिनागातत् कथितं पीतवन्तं भरकामतः। रमयेयुः प्रिया नाय॑ अक्रोदावर्तिनं नरम् ॥३३॥ :
शुक्र-उदावतं मे वस्ति को: शुद्ध करनेवाठे ( ककरी कूष्माण्ड के वीज, पचदृमूढ आदि ) दरा
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