सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
प्राचीन काल में आयुर्वेद बहुत ही उन्नत और विस्तारशील था। उस समय उसके कायचिकित्सादि अष्टांग स्वतन्त्र हो चुके थे, प्रत्येक अंग पर स्वतन्त्र संहिताएँ रची गयी थीं, प्रत्येक अंग की स्वतन्त्र परम्परा स्थापित हो चुकी थी और उसके विशेषज्ञ प्रतिष्ठा के साथ अपना स्वतन्त्र व्यवसाय किया करते थे। आगे चलकर कालचक्र में ये सब परम्पराएँ बहुत कुछ खण्डित या लुप्त हो गयी थीं। शताब्दियों के पश्चात् ऋषितुल्य कुछ धुरंधर विद्वानों ने अविश्रान्त परिश्रम, तत्त्वान्वेषण और परम्पराप्राप्त ज्ञान के आधार पर आयुर्वेद की मुख्य २ शाखाओं की संहिताओं का प्रतिसंस्करण करके वैद्यों के उपयोग के लिए उनको प्रचलित किया। आज हमारे सामने आयुर्वेद की जो संहिताएँ उपलब्ध हैं उनमें कुछ प्रतिसंस्कृत हैं, कुछ खण्डित हैं और कुछ संगृहीत हैं। प्रतिसंस्कृत संहिताओं में चरक संहिता और सुश्रुत संहिता, खण्डित संहिताओं में मेड संहिता और काश्यप संहिता तथा संगृहीत संहिताओं में अष्टांग हृदय और अष्टांग संग्रह प्रसिद्ध हैं।
उत्तर काल में उपलब्ध होनेवाली सब संहिताओं में चरक और सुश्रुत की संहिताएँ प्राचीन काल से वैद्यकीय दृष्ट्या सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं और वैद्यों का वैद्यत्व इतर संहिताओं की अपेक्षा इन संहिताओं के अनुसार पठन-पाठन-कर्मभ्यास करने के ऊपर अधिष्ठित रहा है। इस कथन की पुष्टि निम्नलिखित वाग्भट और हर्ष के वचनों से हो जाती है—
ऋषिप्रणीते प्रीतिश्चैन्मुखत्वा चरकसुश्रुतौ ।
मेडाद्याः किं न पठ्यन्ते तस्माद् प्राह्य सुभाषितम् ॥ अष्टांगहृदय ॥
कन्यान्तः पुरबाधनाय यदधीकाराच्च दोषा नृपं
द्वौ सन्निप्रवरश्च तुल्यमगदङ्कारश्च तावृचतुः ।
देवाकर्ण्य सुश्रुतेन चरकस्योक्तेन जानेऽखिलं
स्यादस्यानलदं बिता न दलने तापस्य कोऽपि क्षमः ॥ नषधचरित ।
चरक की मूल संहिता अग्निवेश प्रणीत कायचिकित्सा की और सुश्रुत की मूल संहिता भगवान् धन्वन्तरि प्रणीत शल्यतन्त्र की थी। परन्तु शताब्दियों से उपलब्ध इन प्रतिसंस्कृत संहिताओं में आयुर्वेद के आठों अंगों का न्यूनाधिक अंश में समावेश किया हुआ दिखाई देता है। फिर भी सूक्ष्म अभ्यास करने पर इन संहिताओं के मूल संहिताकारों के 'बुद्धैर्विशेषः' का तथा मूल संहिताओं के 'विषय विशेष' का अच्छा परिचय मिल जाता है।
यद्यपि ये दोनों संहिताएँ आयुर्वेद का अभ्यास करने की दृष्टि से शताब्दियों से अधिमान्य हो चुकी हैं तथापि दोनों का तुलनात्मक परिशीलन करने पर मेरा यह मत हो गया है कि चिकित्सा के सिद्धान्तों की दृष्टि से चरक और 'प्रक्रिया' अर्थात् व्यवहार की दृष्टि से सुश्रुत श्रेष्ठ है। चरक में स्वास्थ्यरक्षा, व्याधिपरिमोक्ष, वैद्यकीय सद्बुद्धि इनका प्रतिपादन बहुत ही युक्तियुक्त, रोचक और विशद पद्धति से किया गया है और उसमें उन विषयों के सम्बन्ध में ऐसे दिनकालाबाधित सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं कि जो मृत, वर्तमान तथा भविष्य कालीन संसार की सब चिकित्सा पद्धतियों (व्याधियों) के लिये सदैव मार्ग दर्शन कर सकते हैं। 'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्' यह हृदयल का चरक सम्बन्धी वचन अन्य बातों के लिए भले ही सही न हो, परन्तु चिकित्सा सिद्धान्तों की दृष्टि से सोलहों आने सत्य है ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास हो गया है। सुश्रुत में सैद्धान्तिक विषयों के अतिरिक्त आयुर्वेद के आठों अंगों का विवरण शल्य कर्म को प्राधान्य देकर नातिसंक्षेप-विस्तार से सरल भाषा से व्यावहारिक बातों पर ध्यान देकर बहुत ही अच्छी तरह किया गया है। मेरे इस मत की कुछ झलक वाग्भट के निम्न वचन में मिल जाती है—
यदि चरकभधीते तद् ध्रुवं सुश्रुतादि-
प्रणिगदितगदानी नाममात्रेऽपि बाह्यः ।
अथ चरमविहीनः प्रक्रियायामखिन्नः
किमिह खलु करोतु व्याधिज्ञातां नराकः ॥ अष्टांगहृदय ॥