भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

४२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १२

दहन कार्य के निम्न साधन हैं। यथा—पिप्पली, अजा शकृत (बकरी की मींगनी), गाय का दन्त, शर, शलाका, जाम्बवौष्ट, इतरलोह (लोहा ताँवा-चाँदी आदि), शहद, गुड़ और स्नेह (तैलादि)। इनमें पिप्पली, अजाशकृत, गोदन्त, शर, शलाका से त्वचा के रोगों में, जाम्बवौष्ट, इतरलोह से मांस के रोगों में, मधु, गुड़ और स्नेह से सिरा, स्नायु, सन्धि-गत रोगों में अग्निकर्म करना चाहिये ॥४॥

तत्राग्निकर्म सर्वतुषु कुर्यादन्यत्र अरद्भ्रीष्माभ्यां, तत्राप्यात्ययिकेऽग्निकर्मसाध्ये व्याधौ तत्प्रत्यनीकं विधिं कृत्वा ॥५॥

शरद् (पित्तप्रकोप के कारण), और श्रीष्म श्रुतु को छोड़कर अन्य सब ऋतुओं में अग्निकर्म करना चाहिये। इन ऋतुओं में भी यदि आवश्यकता पड़े तो, विपरीत उपचार (शीताच्छादन, भोजन आदि) करके, अग्निकर्मसाध्य रोगों में अग्निकर्म करना चाहिये। यथा—चरक में—“आत्ययिके पुनः कर्मणि काममृतुं विकल्प्य कुत्रिमगुणोपधेन यथर्तुगुणविपरीतेन भेषजं संयोगसंस्कारप्रमाणविकल्पेनोपपाद्य प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा प्रयोजयेत्” ॥५॥

सर्वव्याधिष्वतुषु च पिच्छिलमन्मं सुक्तवतः मृदुगर्भाऽमरीभगन्दरोदराग्रीमुखरोगेष्वसुक्तवतः कर्म कुर्यात् ॥६॥

सर्व रोगों में और सब श्रुतुओं में पिच्छिल (बलकारक) गुणवाला अन्न खिलाकर अग्निकर्म करना चाहिये। मृदुगर्भ, अश्मरी, भगन्दर, अर्श, मुखरोगों में त्रिना भोजन कराये कर्म करना चाहिये ॥६॥

तत्र द्विविधमग्निकर्महुरेके-त्वरदग्धं, मांसदग्धं च, इह तु सिरास्नायुसन्ध्यस्थिष्वपि न प्रतिषिद्दोऽग्निरः ॥७॥

कई आचार्यों का मत है कि—अग्निकर्म दो प्रकार का है। यथा—त्वरदग्ध और मांसदग्ध। इस शास्त्र में सिरास्नायु, सन्धि, अस्थि आदि में आवश्यकतानुसार अग्निकर्म करना चाहिये, इसमें अग्निकर्म का निषेध नहीं है ॥७॥

तत्र, शब्दप्रादुर्भावो दुर्गन्धता त्वकसंकोचश्च त्वगदग्धे, कपोतवर्णताऽल्पश्वयथुवेदना शुष्कसंकुचितव्रणता च मांसदग्धे, कृष्णेनन्तव्रणता स्नावसन्निरोधश्च सिरास्नायुदग्धे रूक्षाकृणता कर्कशस्थिरव्रणता च सन्ध्यस्थिदग्धे ॥८॥

त्वचा के जलने पर—शब्दोत्पत्ति, दुर्गन्धता और त्वचा का संकोच होता है। मांस के जलने पर—कबूतर का जैसा

१ कई आचार्यों से अभिप्राय—काव्यप से है। यथा—

“न सिरास्नायुसन्ध्यस्थिममंस्वपि कथंचन।

देशस्योत्कर्त्तनं कार्यं दाहो वा भिषजाऽनिना ॥”

परन्तु रक्ततिस्राव की अवस्था में इनके अन्दर भी अग्निकर्म करना चाहिये। यथा “सिरास्नायुसन्ध्यस्थिच्छेदशोणितातिप्रवृत्तिषु सिरादिदाहः। संग्रहः।

नीला रङ्ग, थोड़ी सूजन, वेदना; व्रण शुष्क और संकुचित होता है। सिरा एवं स्नायु के जलने पर—काला रङ्ग, व्रण का ऊपर उठ जाना, और स्नाव का निरोध हो जाता है। सन्धि-अस्थि के जलने पर—रूक्षता, लालिमा, कर्कशता और व्रण में कठिनता आ जाती है ॥८॥

तत्र शिरोरोगाधिमन्थयोर्भूल्लटाटशङ्खप्रदेशेषु दहेन, वत्सरोरोषवाद्ग्रील्लक्तप्रतिच्छन्नां दृष्टिं कृत्वा वत्सरोमकृपात् ॥९॥

शिर के रोगों में तथा अधिमन्थ (अक्षिरोग) में—भू, ल्लटाट, शङ्ख-प्रदेश में दाह कर्म करना चाहिये। वत्स रोगों में दृष्टि को गीले वस्त्र से ढाँपकर पलकों के बालों को जड़ों में जलाना चाहिये ॥९॥

त्वक्मांससिरास्नायुसन्ध्यस्थिस्थितेऽत्यग्रहजि वायावुच्छितकठिनसुप्तमासे व्रणे ग्रन्थ्यशोर्बुदभगन्दरापचीरलीपदचर्मकीलतिलकालकान्त्रवृद्धिसन्धिंसिराच्छेदनादिषु नाडीशोणितातिप्रवृत्तिषु चार्मिकर्म कुर्यात् ॥१०॥

त्वचा, मांस, सिरा, स्नायुसन्धि-अस्थि में स्थित वायु की तीव्र वेदना में, व्रण में मांस उठ जाये, चेतना रहित मांसयुक्त व्रण में, ग्रन्थि, अर्श, अर्बुद, भगन्दर, अपची, रलीपद, चर्मकील, तिलकालक, अन्त्रवृद्धि, सन्धि रोग, सिरा, छेदन आदि कार्यों में, नाडीव्रण, रक्त के अतिस्राव होने पर—अग्निकर्म करना चाहिये ॥१०॥

तत्र वलय-विन्दु-बिलेखा-प्रतिसारणानीति दहनविशेषाः ॥११॥

रोग के आश्रय भेद से अग्निकर्म चार प्रकार का है। यथा—वलय (गोल चिह्न), विन्दु, बिलेखा (तिरछी, मृग, टेदी—नाना प्रकार की रेखायें) प्रतिसारण—(गरम लोहे की शलाकाओं से अवधर्षण), ये दहनकर्म के भेद हैं। इसके अतिरिक्त संग्रह में—अर्धचन्द्र, स्वस्तिक और अष्टापद तीन अधिक दिये हैं ॥११॥

भवति चात्र—

रोगस्थ संस्थानभवेदय सम्यज्

तरस्य मर्मानि बलायलं च।

व्याधिं तथर्तुं च समोदय सम्यक

ततो व्यवस्येद्विषगग्निकर्म ॥१२॥

कहा भी है—

रोगोत्पत्ति के स्थान को भली प्रकार देखकर, मनुष्य के मर्मों का बल और अवल का विचार करके, श्रुतु, आदि को देखकर वैद्य अग्निकर्म में प्रवृत्ति या निवृत्ति का निश्चय करे ॥१२॥

१ संग्रह में दाहविधि—अथ दाहाहंमातुरं कृतस्वस्त्ययनमुपहृतसर्वोपकरणं प्राक्शिरःसविष्टमाप्ताव-