भारतकोश
स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

Devanagarihipublished94 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 94 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

(४)

(स्वरोदय विज्ञान)

केवल स्वस्थ मनुष्यों की होती है। यदि शरीर में कुछ गड़बड़ है तो निःसंदेह स्वर में कुछ फर्क पड़ जावेगा। यदि पक्ष के आरम्भ में लगातार तीन दिन तक स्वर उल्टा चले तो प्रायः १५ रोज तक शरीर में एक न एक नयी व्याधि सताया करती है। यदि कोई मनुष्य केवल स्वर ठीक कर सके तो कम से कम बहुत बीमार न रहेगा और यदि बीमारी रहेगी तो बहुत ज्यादा जोर न करेगी।

पंच-तत्वों का वर्णन

आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल—ये पाँच तत्व हैं। हर एक नासिका—नथने से एक स्वर पाँच घड़ी तक चलता है, फिर दूसरी नासिका—नथने से चलने लगता है। जब स्वर चलता है, तो उसमें तत्व भी एक—एक घड़ी के हिसाब से चलते हैं, सबसे पहिली घड़ी में वायु तत्व चलता है, फिर क्रमानुसार अग्नि, पृथ्वी और जल तत्व चला करते हैं। वायु तत्व इस प्रकार नहीं चलता। वह हर एक तत्व के साथ थोड़ी—थोड़ी देर चलकर अपनी एक घड़ी पाँच घड़ी में से ले लेता है, इस तरह कुल २४ घण्टों में अर्थात् ६० घड़ी में पाँच तत्व १२ बार बदलते हैं। यह तो हुई दशा अलग अलग तत्वों की, इन पाँचों तत्वों के मेल से हर एक के पाँच भाग हो जाते हैं। उदाहरण के लिए वायु तत्व कीजिये :-

प्रथम — वायु में वायु

द्वितीय — वायु में अग्नि

तीसरे — वायु में पृथ्वी

पाँचवें — वायु में आकाश

यह बात गणित से भली भाँति मालूम हो सकती है परन्तु स्वरोदय के अभ्यासी को गणित करने की कोई आवश्यकता नहीं है: क्योंकि प्रत्येक तत्व