भारतकोश
स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

Devanagarihipublished94 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 94 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

(१८)

(स्वरोदय विज्ञान)

स्वरोदय शास्त्र और आरोग्यता

इस विद्या का अभ्यासी बहुत ही स्वस्थ रह सकता है। वह दूसरों की बीमारी भी दूर कर सकता है। तत्त्व और स्वर इनके विपरीत चलने से ही बीमारी होती है। और बीमारी होने से ये विपरीत चलने लगते हैं। यदि तत्त्व और स्वर समय पर चलें तो कोई बीमारी नहीं हो सकती। यदि जरा भी भेद मालूम हो, तो जान लो कि बीमारी का प्रवेश हो गया है। उसी समय स्वर को ठीक करने का प्रयत्न करो इससे एकदम तो बीमारी नष्ट न हो जावेगी परन्तु कम अवश्य होगी। साधारण बीमारी तो इसी से दूर हो जावेगी। यदि स्वर और तत्त्व ठीक चल रहे हों, तो उनको कभी भी नहीं बदलना चाहिए। स्वरों में चन्द्र स्वर और तत्त्वों में जल और पृथ्वी स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुए हैं। आकाश तत्त्व मृत्युकारी है। अग्नि और वायु का भी जहाँ प्रवाह अधिक होगा,, वहाँ बीमारी अधिक होगी।

सूर्यस्वर गर्म और चन्द्रस्वर ठण्डा है। इसलिये यदि कोई बीमारी शनि के कारण है, तो इसके लिये सूर्यस्वर लाभदायक है। इसी प्रकार गर्मी के कारण जो जो बीमारियाँ होती हैं, उनके लिये चन्द्रस्वर लाभदायक है। साथ साथ तत्त्वों का भी ध्यान रक्खा जावे।