स्वप्नदोष चिकित्सा
Swapnadosh Chikitsa
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)
औषध चिकित्सा
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४-जल-चिकित्सा
स्वप्दोष से बचने के लिए प्रतिदिन दोनों समय शीतलजल से स्नान करो। प्रतिदिन सोते समय भी स्नान से बड़ा लाभ होता है।
स्नान के समय नाभि के नीचे शीतलजल की खूब देर तक धार डालो। साथ ही प्रतिदिन जब-जब शौच या लघुशंका करने जावो तो शीतलजल का एक बड़ा पात्र साथ लेजाओ और मूत्रेन्द्रिय के अगले भाग पर छिद्र के ऊपर बारीक धार पांच मिनट तक डालो। यह मूत्रेन्द्रियस्नान सोने से पूर्व भी करो। अण्डकोष और मूत्रेन्द्रिय के आसपास के भागों को भी धोडालो। इससे मसाने में ठण्डक रहेगी। सोने से पूर्व हाथ-पैर, शिर ग्रीवा (गर्दन) धोडालो। इन सब क्रियाओं के करने से ५० प्रतिशत स्वप्रदोष की संख्या घटजाती है। बहुतों का स्वप्नदोष तो सर्वथा इससे ही दूर होगया है।
५-मलाशय और मूत्राशय की शुद्धता
सोने से पूर्व अधिक खाने-पीने से मलाशय तथा मूत्राशय भरजाते हैं और मल-मूत्र का दबाव वीर्यकोष पर पड़ता है। जिससे स्वप्दोष होजाता है। 'एकभुक्त रोगमुक्त' होता है। अतः स्वप्रदोष के रोगी को एक समय भोजन करना चाहिये वा सोने से तीन या चार घण्टे पूर्व थोड़ीसी मात्रा में ताजा गोदुग्ध लेले वा हल्कासा भोजन करे। सोते समय खाली पेट हो। कई युवकों वा बालकों को सोते समय दूध वा जल पीने से ही स्वप्रदोष होने लगता है। अतः सोने से तीन चार घण्टे पूर्व खाना पीना बन्द करदेना चाहिये। बहुत बार तो स्वप्रदोष पेट के भारी होने से तथा खाने-पीने की छोटी-छोटी भूलों से ही होता रहता है। अजीर्ण (कब्ज) कभी न होने दो। अजीर्ण दूर करने के लिये आसन-व्यायाम प्रतिदिन करो। मल-मूत्र के वेग को कभी न रोको। रात्रि को आँख खुलने पर लघुशंका अवश्य करलो। आलस्य न करो। प्रातःकाल ३ व ४ बजे के बीच में उठकर मल-मूत्र का त्याग करो। उस समय सोते रहने से मल-मूत्र से मलाशय और मूत्राशय भरेहुये रहते हैं। उनका वीर्यकोष पर दबाव पड़ने से त्रैर्यनाश होजाता है। मलत्याग (शौच) करने का स्वभाव दोनों समय का बनाओ। पेट में मल पड़े रहने से भी स्वप्रदोष होजाता है।
६-औषध-चिकित्सा
(१) जिनको अजीर्ण रहता है वे चार-छः छटांक त्रिफले को कपड़े में छानकर एक छटांक गोघृत वा बादामरोगन में भिगो और चार छटांक खांड मिलाकर रखलें। रात को यह एक तोला औषध थोडेसे (नाममात्र) गर्मदूध वा ताजेजल के साथ सेवन करें। इससे अजीर्ण तथा प्रमेह भी दूर होता है। कफप्रकृतिवालों के लिये रामबाण है।
(२) सितावर एक छटांक, असगन्ध नागोरी एक छटांक, विधारा के बीज
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स्वप्रदोष की चिकित्सा
एक छटांक (लकड़ी नहीं केवल बीज ही लेने हैं), इन सबको बारीक पीसकर कपड़छान कर लो। इसमें तीन छटांक खांड वा मिसरी मिला लो। यह सबके लिये अत्यन्त आवश्यक है। स्वप्रदोष को यह औषध अवश्यमेव दूर करती है। कितने ही अच्छे-अच्छे वैद्यों ने इसे हजारों बार अनुभव किया है। यह औषध ऐसे युवकों के लिये जो स्कूल वा कालेज आदि में पढ़ते हों वा अविवाहित हों, बहुत ही लाभदायक सिद्ध होता है। किन्तु इतना ध्यान रखना चाहिये यदि स्वप्रदोष का रोगी शरीर से बलवान् है और साथ ही ब्रह्मचारी है जिसके शरीर में वीर्य पर्याप्तमात्रा में है, ऐसे युवक वा विद्यार्थी को स्वप्रदोष वीर्य की अधिकता के कारण हो तो उसे ताजेजल के साथ ही दो वा तीन माशे से अधिक नहीं दें। किन्तु जो रोगी अपने हाथों अपना सर्वनाश कर चुका हो और इसी प्रकार की गुदामैथुनादि कुटेवों के कारण इस स्वप्रदोष को खरीदा हो, उसे पहिले तो सब बुराइयाँ छोड़ देनी चाहिए। फिर वह इस औषध को तीन माशे से छः माशे तक दोनों समय ताजा धारोष्ण गोदुग्ध (ताजा निकले हुए गाय के दूध) के साथ प्रयोग करे। इससे स्वप्रदोष ही दूर नहीं होता इससे शरीर में वीर्य की वृद्धि पर्याप्तमात्रा में होती है। वीर्य गाढ़ा हो जाता है। खूब बल और शक्ति बढ़ती है। यह औषध रामबाण है।
(३) आयुर्वेदिक फार्मसी, गुरुकुल झज्जर ने स्वप्रदोषचिकित्सा के लिये स्वप्रदोषामृत नामक औषध का निर्माण किया है। अनेक रोगियों पर हमने प्रयोग करके देखा है, वह स्वप्रदोष के रोगियों को अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुई है।
७-शीर्षासन तथा व्यायाम
व्यायाम किये बिना वीर्य-रक्षा असम्भव है। व्यायाम से वीर्य शरीर का अङ्ग बन जाता है। स्वप्रदोषादि विकार बहुत कुछ व्यायाम से ही दूर होजाते हैं। व्यायाम में शीर्षासन तो स्वप्रदोष तथा प्रमेह की अच्छूक औषध है। शीर्षासन दस सैकिंड से आरम्भ करके शनैः-शनैः प्रतिदिन बढ़ाये। बढ़ाते समय अपनी शक्ति और भोजन का ध्यान रखें। यह अनुभवसिद्ध है जब शीर्षासन का १० वा १५ मिनट तक अभ्यास होजाता है तो स्वप्रदोष तथा वीर्यसम्बन्धी सभी रोग दूर भाग जाते हैं। स्वास्थ्य आदर्श तथा मुख तेजस्वी होजाता है। बुद्धि और मस्तिष्क की शक्ति की वृद्धि होती है। शीर्षासन सब व्यायामों से पूर्व करो तथा दोनों समय (शौच से पीछे) शिर के नीचे कपड़े की गद्दी रखकर करो। इसकी पूरी विधि किसी पुस्तक में देख लो।
यह लेख संक्षेप से लिखा है, तदर्थ सचेत रहें। किन्तु जो साधन स्वप्रदोष को दूर करने के लिये लिखे हैं वे सुने-सुनाये नहीं अपितु अनेक रोगियों पर अनुभव कियेगये हैं। आप स्वयं परीक्षण करके देखोगे तो सारी आयु ऋषियों के गुण गाते-गाते नहीं थकोगे। यदि कुछ भी विद्यार्थियों वा युवकों ने इस लेख से लाभ उठाया तो मैं अपने को कृतार्थ समझूंगा।
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A circular logo with a blue outer ring and a white inner ring. Inside the inner ring is a circular image of a deity, likely Saraswati, holding a veena and a mridanga. The text 'वैदिक पुस्तकालय' is written in yellow Devanagari script along the top and bottom inner edges of the blue ring.
An illustration of three wooden blocks stacked vertically, representing the three Vedas. The top block is labeled '॥ यजुर्वेद ॥', the middle block is labeled '॥ सामवेद ॥', and the bottom block is labeled '॥ अथर्ववेद ॥'. The background is a fiery red and orange, suggesting a sacred or intense atmosphere.