भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 261 में से

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पृष्ठ 102

९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ब्रह्मज्ञानके फल, सृष्टिक्रम और अन्नमय कोशरूप पक्षीका वर्णन संहितादिविषयाणि कर्मभि- | कर्मसे अविरुद्ध संहितादिविषयक उपक्रमः रविरुद्धान्युपासना- | उपासनाओंका पहले वर्णन किया न्युक्तानि । अनन्तरं | गया । उसके पश्चात् व्याहृतियोंके चान्तःसोपाधिकात्मदर्शनमुक्तं | द्वारा स्वाराज्यरूप फल देनेवाला व्याहृतिद्वारेण स्वाराज्यफलम् । | हृदयस्थित सोपाधिक आत्मदर्शन न चैतावताशेषतः संसारबीज- | कहा गया । किन्तु इतनेहीसे संसार- स्योपमर्दनमस्तीत्यतोऽशेषोपद्रव- | के बीजका पूर्णतया नाश नहीं हो बीजस्याज्ञानस्य निवृत्त्यर्थं विधूत- | जाता । अतः सम्पूर्ण उपद्रवोंके सर्वोपाधिविशेषात्मदर्शनार्थमिद- | बीजभूत अज्ञानकी निवृत्तिके निमित्त मारभ्यते ब्रह्मविदाप्नोति पर- | इस सर्वोपाधिरूप विशेषसे रहित मित्यादि । | आत्माका साक्षात्कार करानेके लिये | अब 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इत्यादि | मन्त्र आरम्भ किया जाता है । प्रयोजनं चास्या ब्रह्मविद्याया | इस ब्रह्मविद्याका प्रयोजन अविद्या- अविद्यानिवृत्तिस्तत आत्यन्तिकः | की निवृत्ति है; उससे संसारका संसाराभावः । वक्ष्यति च- | आत्यन्तिक अभाव होता है । यही “विद्वान्न बिभेति कुतश्चन” | बात “ब्रह्मवेत्ता किसीसे नहीं डरता” (तै० उ० २ । ९ । १) इति । | इत्यादि वाक्यसे श्रुति आगे कहेगी संसारनिमित्ते च सत्यभयं | भी । संसारके निमित्त [ अज्ञान ] प्रतिष्ठां च विन्दत इत्यनुपपन्नम्, | के रहते हुए ‘पुरुष अभय स्थितिको कृताकृते पुण्यपापे न तपत इति | प्राप्त कर लेता है; तथा उसे कृत च । अतोऽवगम्यतेऽस्माद्विज्ञाना- | और अकृत अर्थात् पुण्य और पाप त्सर्वात्मब्रह्मविषयादात्यन्तिकः | ताप नहीं पहुँचाते’ ऐसा मानना संसाराभाव इति । | सर्वथा अयुक्त है । इससे जाना | जाता है कि इस सर्वात्मक ब्रह्म- | विषयक विज्ञानसे ही संसारका | आत्यन्तिक अभाव होता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri