तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ तस्यैवमविद्ययानाप्तब्रह्मस्व- | जिस प्रकार प्रकृत ( दशम ) रूपस्य प्रकृतसंख्यापूरणस्यात्म- | संख्याको पूर्ण करनेवाला अपना-आप नोऽविद्ययानाप्तस्य सतः केन- | अविद्यावश अप्राप्त रहता है और फिर चित्स्मारितस्य पुनस्तस्यैव वि- | किसीके द्वारा स्मरण करा दिये जाने- द्ययाप्तिर्यथा तथा श्रुत्युपदिष्टस्य | पर विद्याद्वारा उसकी प्राप्ति हो जाती सर्वात्मब्रह्मण आत्मत्वदर्शनेन | है उसी प्रकार अविद्यावश जिसके विद्यया तदाप्तिरुपपद्यत एव । | ब्रह्मस्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती उस सबके आत्मभूत श्रुत्युपदिष्ट ब्रह्मकी आत्मदर्शनरूप विद्याके द्वारा प्राप्ति होनी उचित ही है । ब्रह्मविदाप्नोति परमिति वाक्यं | 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' यह वाक्य [उत्तरग्रन्थावतरणिका] सूत्रभूतम् । सर्वस्य | सूत्रभूत है । जो सम्पूर्ण वल्लीके वल्ल्यर्थस्य ब्रह्म- | अर्थका विषय है, जिसका 'ब्रह्मविदा- विदाप्नोति परमित्यनेन वाक्येन | प्नोति परम्' इस वाक्यद्वारा ज्ञातव्य- वेद्यतया सूत्रितस्य ब्रह्मणोऽनि- | रूपसे सूत्रतः उल्लेख किया गया र्धारितस्वरूपविशेषस्य सर्वतो | है, उस ब्रह्मके ऐसे लक्षणका— व्यावृत्तस्वरूपविशेषसमर्पणसम- | जिसके विशेष रूपका निश्चय नहीं र्थस्य लक्षणस्याविशेषेण चोक्तवेद- | किया गया है और जो सम्पूर्ण नस्य ब्रह्मणो वक्ष्यमाणलक्षणस्य | वस्तुओंसे व्यावृत्त स्वरूपविशेषका ज्ञान करानेमें समर्थ है—वर्णन करते हुए स्वरूपका निश्चय करानेके लिये तथा जिसके ज्ञानका सामान्यरूपसे वर्णन कर दिया गया है उस आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त ब्रह्मको पुरुष उधर आ निकला। उसने सब वृत्तान्त जानकर उन्हें एक लाइनमें खड़ा किया और हाथमें डंडा लेकर एक, दो, तीन—इस प्रकार गिनते हुए हर एकके एक-एक डंडा लगाकर उन्हें दश होनेका निश्चय करा दिया और यह भी दिखला दिया कि वह दशवाँ पुरुष स्वयं गिननेवाला ही था जो दूसरोंमें आसक्तचित्त रहनेके कारण अपनेको भूले हुए था । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri