तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 261 में से
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१०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ भिस्त्रिभिर्विशेषणैर्विशेष्यमाणं ब्रह्म | तीन विशेषणोंसे विशेषित होनेवाला विशेष्यान्तरेभ्यो निर्धार्यते । एवं | ब्रह्म अन्य विशेष्योंसे पृथक्रूपसे निश्चय हि तज्ज्ञानं भवति यदन्येभ्यो | किया जाता है । जिसका अन्य पदार्थों- निर्धारितम् । यथा लोके नीलं | से पृथग्रूपसे निश्चय किया गया है महत्सुगन्ध्युत्पलमिति । | उसका इसी प्रकार ज्ञान हुआ करता | है; जैसे लोकमें 'नील' विशाल और ननु विशेष्यं विशेषणान्तरं | सुगन्धित कमल [—ऐसा कहकर ऐसे (पार्श्व-टिप्पणी: निर्विशेषस्य) व्यभिचरद्विशेष्यते । | कमलका अन्य कमलोंसे पृथक्रूपसे (पार्श्व-टिप्पणी: विशेषणवत्त्वे) यथा नीलं रक्तं | निश्चय किया जाता है ] । (पार्श्व-टिप्पणी: आक्षेपः) चोत्पलमिति । यदा ह्यनेकानि | शङ्का—अन्य विशेषणोंका व्यावर्तन द्रव्याण्येकजातीयान्यनेकविशेषण- | करनेपर ही कोई विशेष विशेषित योगीनि च तदा विशेषणस्यार्थ- | हुआ करता है; जैसे—नीला अथवा वत्त्वम् । न ह्येकस्मिन्नेव वस्तुनि | लाल कमल । जिस समय अनेक द्रव्य विशेषणान्तरायोगात् । यथासा- | एक ही जातिके और अनेक विशेषणों- वेक आदित्य इति, तथैकमेव च | की योग्यतावाले होते हैं तभी ब्रह्म न ब्रह्मान्तराणि येभ्यो | विशेषणोंकी सार्थकता होती है। एक विशेष्येत नीलोत्पलवत् । | ही वस्तुमें, किसी अन्य विशेषणका न; लक्षणार्थत्वाद्विशेषणा- | सम्बन्ध न हो सकनेके कारण, | विशेषणकी सार्थकता नहीं होती । | जिस प्रकार यह सूर्य एक है उसी प्रकार (पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मविशेषणानां) नाम् । नायं दोषः; | ब्रह्म भी एक ही है; उसके सिवा अन्य (पार्श्व-टिप्पणी: तल्लक्षणार्थत्वम्) कस्मात् ? यस्माल्ल- | ब्रह्म हैं ही नहीं, जिनसे कि नील | कमलके समान उसकी विशेषता क्षणार्थप्रधानानि विशेषणानि न | बतलायी जाय । | समाधान—ऐसा कहना ठीक | नहीं है; क्योंकि ये विशेषण लक्षणके | लिये हैं । [ अब इस सूत्ररूप वाक्य- | की ही व्याख्या करते हैं—] यह | दोष नहीं हो सकता; क्यों नहीं हो | सकता ? क्योंकि ये विशेषण लक्षणार्थ- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri