तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ चरदनृतमित्युच्यते। अतः वि- | व्यभिचरित होनेपर वह मिथ्या कहा कारोऽनृतम्। "वाचारम्भणं | जाता है। इसलिये विकार मिथ्या विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव | है। "विकार केवल वाणीसे आरम्भ होनेवाला और नाममात्र है, बस, सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) | मृत्तिका ही सत्य है" इस प्रकार एवं सदेव सत्यमित्यवधारणात्। | निश्चय किया जानेके कारण सत् अतः सत्यं ब्रह्मेति ब्रह्म विका- | ही सत्य है। अतः 'सत्यं ब्रह्म' रान्निवर्तयति। | यह वाक्य ब्रह्मको विकारमात्रसे निवृत्त करता है। अतः कारणत्वं प्राप्तं ब्रह्मणः। | इससे ब्रह्मका कारणत्व प्राप्त [ज्ञानमित्यस्य तात्पर्यम्] कारणस्य च कार- | होता है, और वस्तुरूप होनेसे कत्वं वस्तुत्वान्मृद्व- | कारणमें कारकत्व रहा करता है। [ज्ञानकर्तृत्वभाव-निरूपणं च] दचिद्रूपता च प्रा- | अतः मृत्तिकाके समान उसकी जड- प्ता त इदमुच्यते | रूपताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है। इसीसे 'ज्ञानं ब्रह्म' ऐसा कहा ज्ञानं ब्रह्मेति। ज्ञानं ज्ञप्तिरव- | है। 'ज्ञान' ज्ञप्ति यानी अवबोधको बोधः, भावसाधनो ज्ञानशब्दो | कहते हैं। 'ज्ञान' शब्द भाववाचक न तु ज्ञानकर्तृ ब्रह्मविशेषण- | है; 'सत्य' और 'अनन्त' के साथ ब्रह्मका विशेषण होनेके कारण त्वात्सत्यानन्ताभ्यां सह। न | उसका अर्थ 'ज्ञानकर्ता' नहीं हो सकता। उसका ज्ञानकर्तृत्व स्वीकार हि सत्यतानन्तता च ज्ञान- | करनेपर ब्रह्मकी सत्यता और कर्तृत्वे सत्युपपद्यते। ज्ञान- | अनन्तता सम्भव नहीं है। ज्ञान- कर्तृत्वेन हि विक्रियमाणं कथं | कर्तारूपसे विकारको प्राप्त होनेवाला होकर ब्रह्म सत्य और अनन्त कैसे सत्यं भवेदनन्तं च। यद्धि न | हो सकता है? जो किसीसे भी