भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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१०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


भावाद्धिज्ञानानुपपत्तिः । आत्म- | सम्भव ही नहीं है । आत्माका | विज्ञेयत्व स्वीकार करनेपर तो ज्ञाताके नश्च विज्ञेयत्वे ज्ञातृभावप्रसङ्गः; | अभावका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता | है; क्योंकि वह तो विज्ञेयरूपसे ही ज्ञेयत्वेनैव विनियुक्तत्वात् । | विनियुक्त ( प्रयुक्त ) हो चुका है । | [ अब उसे ज्ञाता कैसे माना जाय ? ] एक एवात्मा ज्ञेयत्वेन ज्ञातृ- | शङ्का—एक ही आत्मा ज्ञेय और | ज्ञाता दोनों प्रकारसे हो सकता है— त्वेन चोभयथा भवतीति चेत् ? | ऐसा मानें तो ? न युगपदनंशत्वात् । न हि | समाधान—नहीं, वह अंशरहित | होनेके कारण एक साथ उभयरूप निरवयवस्य युगपज्ज्ञेयज्ञातृत्वो- | नहीं हो सकता । निरवयव ब्रह्मका | एक साथ ज्ञेय और ज्ञाता होना पपत्तिः । आत्मनश्च घटादिवद्विज्ञे- | सम्भव नहीं है । इसके सिवा यदि | आत्मा घटादिके समान विज्ञेय हो यत्वे ज्ञानोपदेशानर्थक्यम् । न | तो ज्ञानके उपदेशकी व्यर्थता हो | जायगी । जो वस्तु घटादिके समान हि घटादिवत्प्रसिद्धस्य ज्ञानोप- | प्रसिद्ध है उसके ज्ञानका उपदेश | सार्थक नहीं हो सकता । अतः देशोऽर्थवान् । तस्माज्ज्ञातृत्वे | उसका ज्ञातृत्व माननेपर उसकी | अनन्तता नहीं रह सकती । ज्ञान- सति आनन्त्यानुपपत्तिः । | कर्तृत्वादि विशेषसे युक्त होनेपर | उसका सन्मात्रत्व भी सम्भव नहीं सन्मात्रत्वं चानुपपन्नं ज्ञान- | है । और “वह सत्य है” इस एक | अन्य श्रुतिसे उसका सत्यरूप होना कर्तृत्वादिविशेषवत्त्वे सति । स- | ही सन्मात्रत्व है । अतः 'सत्य' और | 'अनन्त' शब्दोंके साथ विशेषण- न्मात्रत्वं च सत्यत्वम्, "तत्स- त्यम्” ( छा० उ० ६ । ८ । १६ ) इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मा- त्सत्यानन्तशब्दाभ्यां सह विशे-


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