भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

१०८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

[वाम स्तम्भ - भाष्यम्] प्राधान्यमित्यवोचाम । शून्ये हि लक्ष्येऽनर्थकं लक्षणवचनं लक्षणा- र्त्थत्वान्मन्म्यामहे न शून्यार्थतेति । विशेषणार्थत्वेऽपि च सत्यादीनां स्वार्थापरित्याग एव । शून्यार्थत्वे हि सत्यादि- शब्दानां विशेष्यनियन्तृत्वानुप- पत्तिः । सत्याद्यर्थैरर्थवत्त्वे तु तद्विपरीतधर्मवद्भ्यो विशेष्येभ्यो ब्रह्मणो विशेष्यस्य नियन्तृत्वमुप- पद्यते । ब्रह्मशब्दोऽपि स्वार्थेनार्थ- वानेव । तत्रानन्तशब्दोऽन्तवत्त्व- प्रतिषेधद्वारेण विशेषणम् । सत्य- ज्ञानशब्दौ तु स्वार्थसमर्पणेनैव विशेषणे भवतः ! "तस्माद्वा एतस्मादात्मनः" इति ब्रह्मण्येवात्मशब्दप्रयोगाद्वेदितु-


[दक्षिण स्तम्भ - भाषानुवाद] सत्यादि शब्द विशेषण होनेपर भी उनका प्रधान प्रयोजन लक्षणके लिये होना ही है—यह हम पहले ही कह चुके हैं । यदि लक्ष्य शून्य हो तब तो उसका लक्षण बतलाना भी व्यर्थ ही होगा । अतः लक्षणार्थ होनेके कारण उनकी शून्यार्थता नहीं है— ऐसा हम मानते हैं । विशेषणके लिये होनेपर भी सत्यादि शब्दके अपने अर्थका त्याग तो होता ही नहीं है । यदि सत्यादि शब्दोंकी शून्यार्थता हो तो वे अपने विशेष्यके नियन्ता हैं—ऐसा नहीं माना जा सकता । सत्यादि अर्थोंसे अर्थवान् होनेपर ही उनके द्वारा अपनेसे विपरीत धर्मवाले विशेष्योंसे अपने विशेष्य ब्रह्म- का नियन्तृत्व बन सकता है । 'ब्रह्म' शब्द भी अपने अर्थसे अर्थवान् ही है । उन [ सत्यादि तीन शब्दों ] में 'अनन्त' शब्द उसके अन्तवत्त्वका प्रतिषेध करनेके द्वारा उसका विशेषण होता है तथा 'सत्य' और 'ज्ञान' शब्द तो अपने अर्थोंके समर्पणद्वारा ही उसके विशेषण होते हैं । शङ्का—"उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ" इस श्रुतिमें 'आत्मा' शब्दका प्रयोग ब्रह्मके ही लिये