भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 261 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

११४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

[संस्कृत-मूलम् / भाष्यम्] व्योम्नीति वा सामानाधिकरण्या- दव्याकृताकाशमेव गुहा। तत्रा- पि निगूढाः सर्वे पदार्थास्त्रिषु कालेषु कारणत्वात्सूक्ष्मतरत्वा- च्च। तस्मिन्नन्तर्निहितं ब्रह्म। हार्दमेव तु परमं व्योमेति न्याय्यं विज्ञानाङ्गत्वेनोपासनाङ्ग- त्वेन व्योम्नो विवक्षितत्वात्। "यो वै स बहिर्धा पुरुषादा- काशः" (छा० उ० ३।१२। ७) "यो वै सोऽन्तःपुरुष आकाशः" (छा० उ० ३।१२। ८) "योऽयमन्तर्हृदय आकाशः" (छा० उ० ३।१२।९) इति श्रुत्यन्तरात्प्रसिद्धं हार्दस्य व्योम्नः परमत्वम्। तस्मिन्हार्दे व्योम्नि या बुद्धिर्गुहा तस्यां निहितं ब्रह्म तद्वृत्त्या विविक्त- तयोपलभ्यत इति। न ह्यन्यथा विशिष्टदेशकालसंबन्धोऽस्ति ब्र- ह्मणः सर्वगतत्वान्निर्विशेषत्वाच्च।

[हिन्दी-अनुवाद/व्याख्या] ही परमाकाश है। अथवा 'गुहायां व्योम्नि' इस प्रकार इन दोनों पदों- का सामानाधिकरण्य होनेके कारण आकाशको ही गुहा कहा गया है; क्योंकि सबका कारण और सूक्ष्मतर होनेके कारण उसमें भी तीनों कालोंमें सारे पदार्थ छिपे हुए हैं। उसीके भीतर ब्रह्म भी स्थित है। परन्तु युक्तियुक्त तो यही है कि हृदयाकाश ही परमाकाश है; क्योंकि उस आकाशको विज्ञानाङ्ग यानी उपासनाके अंगरूपसे बतलाना यहाँ इष्ट है "जो आकाश इस [ शरीर- संज्ञक ] पुरुषसे बाहर है" "जो आकाश इस पुरुषके भीतर है" "जो यह आकाश हृदयके भीतर है" इस प्रकार एक अन्य श्रुतिसे हृदयाकाश- का परमत्व प्रसिद्ध है। उस हृदया- काशमें जो बुद्धिरूप गुहा है उसमें ब्रह्म निहित है; अर्थात् उस (बुद्धि- वृत्ति) से वह व्यावृत्त (पृथक्) रूपसे स्पष्टतया उपलब्ध होता है; अन्यथा ब्रह्मका किसी भी विशेष देश या कालसे सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि वह सर्वगत और निर्विशेष है।