तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ कारणेन नित्येनाविकृतेन सर्व- | आकाशादिके कारण, नित्य, गतेन सत्यज्ञानानन्तलक्षणेन | निर्विकार, सर्वगत, सत्य, ज्ञान एवं | अनन्तरूप, पञ्चकोशातीत सर्वात्मासे पञ्चकोशातिगेन सर्वात्मनात्म- | भी आत्मवान् हैं। वही परमार्थतः वन्तः। स हि परमार्थत आत्मा | सबका आत्मा है—यह बात भी सर्वेषामित्येतदप्यर्थादुक्तं भवति। | इस वाक्यके तात्पर्यसे कह ही दी | गयी है। प्राणं देवा अनु प्राणन्तीत्युक्तं | देवगण प्राणके पीछे प्राणन- तत्कस्मादित्याह । प्राणो हि | क्रिया करते हैं—ऐसा पहले कहा यस्माद्भूतानां प्राणिनामायुर्जीव- | गया। ऐसा क्यों है? सो बतलाते नम् । “यावद्ध्यस्मिञ्शरीरे प्राणो | हैं—क्योंकि प्राण ही प्राणियोंका वसति तावदायुर” (कौ० उ० | आयु—जीवन है। “जबतक इस ३। २) इति श्रुत्यन्तरात्। | शरीरमें प्राण रहता है तभीतक तस्मात्सर्वायुषम् । सर्वेषामायुः | आयु है” इस एक अन्य श्रुतिसे भी सर्वायुः सर्वायुरेव सर्वायुषमित्यु- | यही सिद्ध होता है। इसीलिये वह च्यते । प्राणापगमे मरणप्रसिद्धेः। | ‘सर्वायुष’ है। सबकी आयुका नाम प्रसिद्धं हि लोके सर्वायुष्ट्वं | ‘सर्वायु’ है, ‘सर्वायु’ ही ‘सर्वायुष’ प्राणस्य । | कहा जाता है; क्योंकि प्राण-प्रयाण- | के अनन्तर मृत्यु हो जाना प्रसिद्ध | ही है। प्राणका सर्वायु होना तो | लोकमें प्रसिद्ध ही है। अतोऽस्माद्वाह्यादसाधारणाद- | अतः जो लोग इस बाह्य प्राणोपासन- न्नमयादात्मनोऽप- | असाधारण (व्यावृत्तरूप) अन्नमय फलम् क्रम्यान्तः साधा- | कोशसे आत्मबुद्धिको हटाकर इसके | अन्तर्वर्ती और साधारण [सम्पूर्ण रणं प्राणमयमात्मानं ब्रह्मोपासते | इन्द्रियोंमें अनुगत] प्राणमय कोश- येऽहमस्मि प्राणः सर्वभूताना- | को ‘मैं प्राण सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा