तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ विद्वान्ब्रह्मविदपि कश्चिदितः प्रे- | कोई विद्वान् अर्थात् ब्रह्मवेत्ता भी त्यामुं लोकं समश्नुते प्राप्नोति | इस शरीरको छोड़कर इस लोकको | प्राप्त कर लेता है ? यहाँ मूलमें समश्नुते उ इत्येवंस्थिते, | 'समश्नुते उ' ऐसा पद था । उसमें अयादेशे यलोपे च कृते- | 'अय्' आदेश करके [ ‘लोपः | शाकल्यस्य' इस सूत्रके अनुसार ] ऽकारस्य प्लुतिः समश्नुता ३ उ | 'य्' का लोप करनेपर 'समश्नुत उ' | ऐसा प्रयोग सिद्ध होता है । फिर इति । विद्वान्समश्नुतेऽमुं | 'त' के अकारको प्लुत करनेपर | 'समश्नुता ३ उ' ऐसा पाठ हुआ लोकम् । किं वा यथाविद्वानेवं | है । विद्वान् इस लोकको प्राप्त होता | है ? अथवा अविद्वान्के समान विद्वानपि न समश्नुत इत्यपरः | विद्वान् भी उसे प्राप्त नहीं होता ? प्रश्नः । | यह एक अन्य प्रश्न है । द्वावेव वा प्रश्नौ विद्वदविद्व- | अथवा विद्वान् और अविद्वान्से द्विषयौ । बहुवचनं तु सामर्थ्य- | सम्बन्धित ये केवल दो ही प्रश्न हैं । | इनकी सामर्थ्यसे प्राप्त एक और प्राप्तप्रश्नान्तरापेक्षया घटते । | प्रश्नकी अपेक्षासे ही बहुवचन हो 'असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति | गया है । 'ब्रह्म असत् है — यदि | ऐसा जानता है' तथा 'ब्रह्म है- ब्रह्मेति चेद्वेद' इति श्रवणादस्ति | यदि ऐसा जानता है' ऐसी श्रुति नास्तीति संशयस्ततोऽर्थप्राप्तः कि- | होनेसे 'ब्रह्म है या नहीं' ऐसा | सन्देह होता है । अतः 'ब्रह्म है या मस्ति नास्तीति प्रथमोऽनुप्रश्नः । | नहीं' यह अर्थतः प्राप्त पहला अनु- ब्रह्मणोऽपक्षपातित्वादविद्वान् | प्रश्न है । और ब्रह्म पक्षपाती है नहीं, गच्छति न गच्छतीति द्वितीयः । | इसलिये 'अविद्वान् उसे प्राप्त होता | है या नहीं ?' यह दूसरा अनुप्रश्न ब्रह्मणः समत्वेऽप्यविदुष इव | है तथा ब्रह्म समान है, इसलिये
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri