भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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१७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


मात्माकामयत बहु स्यामिति । स | कहा गया था—'आत्माने कामना की यथाकामं चाकाशादिकार्यं सच्च- | कि मैं बहुत हो जाऊँ' । वह अपनी दादिलक्षणं सृष्ट्वा तदनु प्रविश्य | कामनाके अनुसार सत् त्यत् आदि पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन् | लक्षणोंवाले आकाशादि कार्यवर्गको बहुभवत्तस्मात्तदेवेदमाकाशादि- | रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हो द्रष्टा, कारणं कार्यस्थं परमे व्योमन् | श्रोता, मन्ता और विज्ञातारूपसे हृदयगुहायां निहितं तत्प्रत्ययाव- | बहुत हो गया । अतः आकाशादि- भासविशेषेणोपलभ्यमानमस्ति | के कारण, कार्यवर्गमें स्थित, इत्येवं विजानीयादित्युक्तं भवति । | परमाकाशके भीतर बुद्धिरूप गुहामें छिपे हुए और उसके कर्त्ता-भोक्तादि- तदेतस्मिन्नर्थे ब्राह्मणोक्त एष | रूप जो प्रत्ययावभास हैं उनके द्वारा श्लोको मन्त्रो भवति । यथा | विशेषरूपसे उपलब्ध होनेवाले उस पूर्वेषु अन्नमयाद्यात्मप्रकाशकाः | ब्रह्मको ही 'वह है' इस प्रकार जाने- पञ्चस्वप्येवं सर्वान्तरतमात्मास्ति- | ऐसा कहा गया । त्वप्रकाशकोऽपि मन्त्रः कार्य- | उस इस ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही द्वारेण भवति ॥ १ ॥ | यह श्लोक यानी मन्त्र है । जिस प्रकार पूर्वोक्त पाँच पर्यायोंमें अन्नमय आदि कोशोंके प्रकाशक श्लोक थे उसी प्रकार सबकी अपेक्षा आन्तरतम आत्माके अस्तित्वको उसके कार्यद्वारा प्रकाशित करनेवाला भी यह मन्त्र है ॥ १ ॥


इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥