तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 196, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ च तद्विषयमकामहतत्वं च नि- | उससे होनेवाले धर्म एवं ज्ञान तथा | तद्विषयक अकामहतत्व सबसे बढ़े रतिशयं यत्र स एष हिरण्यगर्भो | हुए हैं वह यह हिरण्यगर्भ ही ब्रह्मा ब्रह्मा, तस्यैष आनन्दः श्रोत्रि- | है। उसका यह आनन्द श्रोत्रिय, | निष्पाप और अकामहत पुरुषद्वारा येणावृजिनेनाकामहतेन च सर्वतः | सर्वत्र प्रत्यक्ष उपलब्ध किया जाता | है। इससे यह जाना जाता है कि प्रत्यक्षमुपलभ्यते । तस्मादेतानि | [ निष्पापत्व, अकामहतत्व और | श्रोत्रियत्व ] ये तीन उसके साधन त्रीणि साधनानीत्यवगम्यते । | हैं। इनमें श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व तत्र श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे | तो नियत ( न्यूनाधिक न होनेवाले ) | धर्म हैं किन्तु अकामहतत्वका नियते अकामहतत्वं तूत्कृष्यत | उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता है; इसलिये | यह प्रकृष्ट-साधनरूपसे जाना इति प्रकृष्टसाधनतावगम्यते । | जाता है। तस्याकामहतत्वप्रकर्षतश्चोपल- | उस अकामहतत्वके प्रकर्षसे भ्यमानः श्रोत्रियप्रत्यक्षो ब्रह्मण | उपलब्ध होनेवाला तथा श्रोत्रियको | प्रत्यक्ष अनुभव होनेवाला वह ब्रह्माका आनन्दो यस्य परमानन्दस्य | आनन्द जिस परमानन्दकी मात्रा मात्रैकदेशः । “एतस्यैवानन्द- | अर्थात् केवल एकदेशमात्र है, जैसा स्यान्यानि भूतानि मात्रामुप- | कि “इस आनन्दके लेशसे ही अन्य | प्राणी जीवित रहते हैं” इस अन्य जीवन्ति” ( बृ० उ० ४ । ३। | श्रुतिसे सिद्ध होता है, वह यह ३२ ) इति श्रुत्यन्तरात् । स एष | हिरण्यगर्भका आनन्द, जिस- | की मात्राएँ ( लेशमात्र आनन्द ) आनन्दो यस्य मात्राः समुद्राम्भस | समुद्रके जलकी बूँदोंके समान इव विप्रुषः प्रविभक्ता यत्रैकतां | विभक्त हो पुनः उसमें एकत्वको
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