तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 199, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९३
[मूल संस्कृत-भाष्यम् (वामभागः)] युक्तो निर्देष्टुम् । परमात्मविज्ञानं च विवक्षितम् । तस्मात्पर एव निर्दिश्यते 'स एकः' इति । नन्वानन्दस्य मीमांसा प्रकृता तस्या अपि फलमुपसंहर्तव्यम् । अभिन्नः स्वाभाविक आनन्दः परमात्मैव न विषयविषयि- संबन्धजनित इति । ननु तदनुरूप एवायं निर्देशः 'स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः' इति भिन्नाधिकरणस्थ- विशेषोपमर्देन । नन्वेवमप्यादित्यविशेषग्रहण- मनर्थकम् । नानर्थकम् , उत्कर्षापकर्षा- पोहार्थत्वात् । द्वैतस्य हि मूर्त्ता- मूर्तलक्षणस्य पर उत्कर्षः सवि- त्रभ्यन्तर्गतः स चेत्पुरुषगत-
[हिन्दी-भाष्यार्थः (दक्षिणभागः)] पुरुष ] का अकस्मात् निर्देश करना उचित नहीं है । यहाँ परमात्माका विज्ञान वर्णन करना ही अभीष्ट है; इसलिये 'वह एक है' इस वाक्यसे परमात्माका ही निर्देश किया जाता है । शङ्का—यहाँ तो आनन्दकी मीमांसाका प्रकरण है, इसलिये उसके फलका उपसंहार भी करना ही चाहिये; क्योंकि अखण्ड और स्वाभाविक आनन्द परमात्मा ही है, वह विषय और विषयीके सम्बन्धसे होनेवाला आनन्द नहीं है । मध्यस्थ—'जो आनन्द इस पुरुषमें है और जो इस आदित्यमें है वह एक है' इस प्रकार भिन्न आश्रयोंमें स्थित विशेषका निराकरण करके जो निर्देश किया गया है वह तो इस प्रसंगके अनुरूप ही है । शङ्का—किन्तु, इस प्रकार भी 'आदित्य' इस विशेष पदार्थका ग्रहण करना व्यर्थ ही है । समाधान—उत्कर्ष और अपकर्षका निषेध करनेके लिये होनेके कारण यह व्यर्थ नहीं है । मूर्त्त और अमूर्त्तरूप द्वैतका परम उत्कर्ष सूर्यके अन्तर्गत है; वह यदि पुरुषगत विशेषके बाध-
[पाद-टिप्पणी / पाद-संख्या] तै० उ० २५—२६— CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri