तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ विद्यामात्रोपदेशात् । विद्या- | सिद्धान्ती—केवल ज्ञानका ही याश्च दृष्टं कार्यमविद्यानिवृत्ति- | उपदेश किया जानेके कारण । अज्ञानकी निवृत्ति—यह ज्ञानका स्तच्चेह विद्यामात्रमात्मप्राप्तौ | प्रत्यक्ष कार्य है, और यहाँ आत्माकी प्राप्तिमें वह ज्ञान ही साधन बतलाया साधनमुपदिश्यते । | गया है । मार्गविज्ञानोपदेशवदिति चे- | पूर्व०—यदि वह मार्गविज्ञानके उपदेशके समान हो तो ? [ अब त्नात्मत्वे विद्यामात्रसाधनोप- | इसीकी व्याख्या करते हैं—] केवल ज्ञानका ही साधनरूपसे उपदेश देशोऽहेतुः । कस्मात् ? देशान्तर- | किया जाना उसकी परमात्मरूपतामें कारण नहीं हो सकता । ऐसा प्राप्तौ मार्गविज्ञानोपदेशदर्श- | क्यों है ? क्योंकि देशान्तरकी प्राप्तिके लिये भी मार्गविज्ञानका उपदेश होता नात् । न हि ग्राम एव गन्तेति | देखा गया है । ऐसी अवस्थामें ग्राम ही गमन करनेवाला नहीं हुआ चेत् ? | करता—ऐसा माने तो ? न, वैधर्म्यात् । तत्र हि ग्राम- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि वे दोनों समान धर्मवाले नहीं विषयं विज्ञानं नोपदिश्यते । | हैं । * [तुमने जो दृष्टान्त दिया है ] उसमें ग्रामविषयक विज्ञानका उपदेश तत्प्राप्तिमार्गविषयमेवोपदिश्यते | नहीं दिया जाता, केवल उसकी प्राप्तिके मार्गसे सम्बन्धित विज्ञान-
- ग्रामको जानेवाले और ब्रह्मको प्राप्त होनेवालेमें बड़ा अन्तर है । इसके सिवा ग्रामको जानेवालेको जो मार्गके विज्ञानका उपदेश किया जाता है उसमें यह नहीं कहा जाता कि 'तू अमुक ग्राम है' परन्तु ब्रह्मज्ञानका उपदेश तो 'तू ब्रह्म है' इस अभेदसूचक वाक्यसे ही किया जाता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri