तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ चन्द्रस्य सत्त्वं यदतैमिरेकेण | द्वितीय चन्द्रमाकी वास्तविकता यही है कि वह तिमिररोगरहित चक्षुष्मता न गृह्यते । नेत्रोंवाले पुरुषद्वारा ग्रहण नहीं किया जाता। नैवं न गृह्यत इति चेत् ? पूर्व०-परन्तु द्वैतका ग्रहण न होता हो-ऐसी बात तो है नहीं । न, सुषुप्तसमाहितयोर- सिद्धान्ती-ऐसा मत कहो; क्योंकि सोये हुए और समाधिस्थ ग्रहणात् । पुरुषको उसका ग्रहण नहीं होता । सुषुप्तेऽग्रहणमन्यासक्तवदिति पूर्व०-किन्तु सुषुप्तिमें जो द्वैतका अग्रहण है वह तो विषयान्तरमें चेत् ? . आसक्तचित्त पुरुषके अग्रहणके समान है ? न, सर्वाग्रहणात् । जाग्रत्स्वप्न- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उस समय तो सभी पदार्थोंका अग्रहण योरन्यस्य ग्रहणात्सत्त्वमेवेति है [ फिर वह अन्यासक्तचित्त कैसे कहा जा सकता है ? ] यदि कहो कि जाग्रत् और स्वप्नावस्था में अन्य चेन्न; अविद्याकृतत्वाज्जाग्र- पदार्थोंका ग्रहण होनेसे उनकी सत्ता है ही, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; त्स्वप्नयोः; यदन्यग्रहणं जाग्रत्स्वप्न- क्योंकि जाग्रत् और स्वप्न अविद्या- कृत हैं। जाग्रत् और स्वप्नमें जो अन्य योस्तदविद्याकृतमविद्याभावेऽभा- पदार्थका ग्रहण है वह अविद्याके कारण है; क्योंकि अविद्याकी निवृत्ति होनेपर उसका अभाव हो जाता है ? वात् । सुषुप्तेऽग्रहणमप्यविद्याकृत- पूर्व०-सुषुप्तिमें जो अग्रहण है वह भी तो अविद्याके ही कारण है। मिति चेत् ?