भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ ❦ ❧ नित्यान्यधिगतानि कर्माण्यु- | सञ्चित पापोंका क्षय ही जिनका उपक्रमः पात्तदुरितक्षयार्था- | मुख्य प्रयोजन है ऐसे नित्यकर्मोंका नि, काम्यानि च | तथा सकाम पुरुषोंके लिये विहित फलार्थिनां पूर्वस्मिन्ग्रन्थे । इदानीं | काम्यकर्मोंका इससे पूर्ववर्ती ग्रन्थमें [ अर्थात् कर्मकाण्डमें ] परिज्ञान हो कर्मोपादानहेतुपरिहाराय ब्रह्म- | चुका है । अब कर्मानुष्ठानके कारणकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मविद्याका विद्या प्रस्तूयते । | आरम्भ किया जाता है । कर्महेतुः कामः स्यात् । | कामना ही कर्मकी कारण हो आत्मविदेवाप्त- प्रवर्तकत्वात् । आ- | सकती है; क्योंकि वही उसकी कामो भवति प्रवर्तक है । जो लोग पूर्णकाम हैं सकामानां हि कामा- | उनकी कामनाओंका अभाव होनेपर भावे स्वात्मन्यवस्थानात् प्रवृत्त्य- | स्वरूपमें स्थिति हो जानेसे कर्ममें प्रवृत्ति होनी असम्भव है । आत्म- नुपपत्तिः । आत्मकामित्वे चाप्त- | दर्शनकी कामना पूर्ण होनेपर कामता; आत्मा हि ब्रह्म; | ही पूर्णकामता [ की सिद्धि ] होती है; क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है और तद्विदो हि परप्राप्तिं वक्ष्यति । | ब्रह्मवेत्ताको ही परमात्माकी प्राप्ति अतोऽविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्य- | होती है ऐसा आगे [ श्रुति ] वस्थानं परप्राप्तिः । “अभयं | बतलायेगी । अतः अविद्याकी निवृत्ति होनेपर अपने आत्मामें स्थित हो प्रतिष्ठां विन्दते” ( तै० उ० २ । | जाना ही परमात्माकी प्राप्ति है; ७ । १) “एतमानन्दमयमात्मा- | जैसा कि “अभय पद प्राप्त कर लेता है” “[ उस समय ] इस आनन्द- नमुपसंक्रामति” ( तै० उ० २ । | मय आत्माको प्राप्त हो जाता है” ८ । १२) इत्यादिश्रुतेः । | इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri