तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें२०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
स्वात्मानमेवोपसंक्रामतीति वि- | प्रकरणका आरम्भ करके अब ‘मनो- रोधः स्यात् । तथा नानन्दमय- | मय अथवा विज्ञानमय अपनेको ही प्राप्त होता है’ ऐसा कहनेमें स्यात्मसंक्रमणमुपपद्यते । तस्मान्न | उससे विरोध आता है । इसी प्रकार प्राप्तिः संक्रमणं नाप्यन्नमयादी- | आनन्दमयका भी अपनेको प्राप्त होना सम्भव नहीं है; अतः प्राप्तिका नामन्यतमकर्तृकम् । पारिशेष्याद- | नाम संक्रमण नहीं है और न वह अन्नमयादिमेंसे किसीके द्वारा किया न्नमयाद्यानन्दमयान्तात्मव्यति- | जाता है । फलतः आत्मासे भिन्न रिक्तकर्तृकं ज्ञानमात्रं च संक्रमण- | अन्नमयसे लेकर आनन्दमय कोश- पर्यन्त जिसका कर्ता है वह ज्ञानमात्र मुपपद्यते । | ही संक्रमण होना सम्भव है ।
ज्ञानमात्रत्वे चानन्दमयान्तः- | इस प्रकार ‘संक्रमण’ शब्दका स्थस्यैव सर्वान्तरस्याकाशाद्यन्न- | अर्थ ज्ञानमात्र होनेपर ही आनन्दमय कोशके भीतर स्थित सर्वान्तर तथा मयान्तं कार्यं सृष्ट्वानुपविष्टस्य | आकाशसे लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त कार्यवर्गको रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हृदयगुहाभिसंबन्धादन्नमयादि- | हुए आत्माका जो हृदयगुहाके ष्वनात्मस्वात्मविभ्रमः संक्रमणे- | सम्बन्धसे अन्नमय आदि अनात्माओं- में आत्मत्वका भ्रम है वह संक्रमण- नात्मविवेकविज्ञानोत्पत्त्या विन- | स्वरूप विवेक ज्ञानकी उत्पत्तिसे नष्ट श्यति । तदेतस्मिन्नविद्याविभ्रम- | हो जाता है । अतः इस अविद्यारूप भ्रमके नाशमें ही संक्रमण शब्दका नाशे संक्रमणशब्द उपचर्यते न | उपचार ( गौणरूप ) से प्रयोग किया गया है; इसके सिवा किसी और ह्यन्यथा सर्वगतस्यात्मनः संक्र- | प्रकार सर्वगत आत्माका संक्रमण मणमुपपद्यते । | होना सम्भव नहीं है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri