तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवम अनुवाक ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले विद्वान्की अभयप्राप्ति यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । एतँह वाव न तपति । किमहँसाधु नाकरवम् । किमहं पाप- मकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानँ स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानँ स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युप- निषत् ॥ १ ॥ जहाँसे मनके सहित वाणी उसे प्राप्त न करके लौट आती है उस ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला किसीसे भी भयभीत नहीं होता । उस विद्वान्को, मैंने शुभ क्यों नहीं किया, पापकर्म क्यों कर डाला—इस प्रकारकी चिन्ता सन्तप्त नहीं करती । उन्हें [ ये पाप और पुण्य ही तापके कारण हैं--] इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् अपने आत्माको प्रसन्न अथवा सबल करता है उसे ये दोनों आत्मस्वरूप ही दिखायी देते हैं । [ वह कौन है ? ] जो इस प्रकार [ पूर्वोक्त अद्वैत आनन्दस्वरूप ब्रह्मको ] जानता है । ऐसी यह उपनिषद् ( रहस्यविद्या ) है ॥ १ ॥ यतो यस्मान्निर्विकल्पाद्यथोक्त- | जिस पूर्वोक्त लक्षणोंवाले | निर्विकल्प अद्वयानन्दरूप आत्माके लक्षणादद्वयानन्दादात्मनो वाचो- | पाससे द्रव्यादि सविकल्प वस्तुओंको | प्रकाशित करनेवाला वाक्य-- ऽभिधानानि द्रव्यादिसविकल्प- | अभिधान, जो वस्तुत्वमें [ ब्रह्मको CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri