भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 261 में से

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पृष्ठ 225

अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१९ इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥


[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) एवं हिन्दी अनुवाद]

संस्कृत भाष्य: अन्नं ब्रह्मेति व्यजानाद्वि- | हिन्दी अनुवाद: अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । वही ज्ञातवान् तद्धि यथोक्तलक्षणो- | उपर्युक्त लक्षणसे युक्त है। सो कैसे ? पेतम् । कथम् ? अन्नाद्ध्येव | क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब खल्विमानि भूतानि जायन्ते; | प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर अन्नेन जातानि जीवन्ति अन्नं | अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तस्मा- | मरणोन्मुख होनेपर अन्नमें ही लीन द्युक्तमन्नस्य ब्रह्मत्वमित्यभि- | हो जाते हैं। अतः तात्पर्य यह है प्रायः । स एवं तपस्तप्त्वाऽन्नं | कि अन्नका ब्रह्मरूप होना ठीक ही ब्रह्मेति विज्ञायान्नलक्षणेनोप- | है। वह इस प्रकार तप करके तथा पत्त्या च पुनरेव संशयमापन्नो | अन्नके लक्षण और युक्तिके द्वारा 'अन्न वरुणं पितरमुपससार अधीहि | ही ब्रह्म है' ऐसा जानकर फिर भी भगवो ब्रह्मेति । | संशयग्रस्त हो पिता वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये' । कः पुनः संशयहेतुरस्येत्यु- | परन्तु इसमें उसके संशयका च्यते-अन्नस्योत्पत्तिदर्शनात् । | कारण क्या था ? सो बतलाया जाता है। अन्नकी उत्पत्ति देखनेसे [ उसे ऐसा सन्देह हुआ ] । यहाँ तपसः पुनः पुनरुपदेशः साधना- | तपका जो बारम्बार उपदेश किया तिशयत्वावधारणार्थः । यावद्ब्र- | गया है वह उसका प्रधान साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् ह्मणो लक्षणं निरतिशयं न भवति | जबतक ब्रह्मका लक्षण निरतिशय यावच्च जिज्ञासा न निवर्तते | न हो जाय और जबतक तेरी जिज्ञासा शान्त न हो तबतक तप तावत्तप एव ते साधनम् । तप- | ही तेरे लिये साधन है । तात्पर्य यह


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