तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवम अनुवाक अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्न-ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ॥ १ ॥ अन्नको बढ़ावे--यह व्रत है। पृथिवी ही अन्न है। आकाश अन्नाद है। पृथिवीमें आकाश स्थित है और आकाशमें पृथिवी स्थित है। इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ अप्सु ज्योतिरित्यब्ज्योति- | पूर्वोक्त 'अप्सु ज्योतिः' आदि मन्त्रके अनुसार जल और ज्योतिकी अन्न और अन्नाद गुणसे उपासना षोरन्नान्नादगुणत्वेनोपासकस्या- | करनेवालेके लिये 'अन्नको बढ़ाना व्रत है' [-यह बात इस मन्त्रमें न्नस्य बहुकरणं व्रतम् ॥ १ ॥ | कही गयी है] ॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri