तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
न च कर्महेतूनां कामानां │ इसके सिवा कर्मकी हेतुभूत ज्ञानाभावे निवृत्त्यसंभवादशेष- │ कामनाओंकी निवृत्ति भी ज्ञानके │ अभावमें असम्भव होनेके कारण कर्मक्षयोपपत्तिः । अनात्मविदो │ उन (नित्यकर्मों) के द्वारा सम्पूर्ण │ कर्मोंका क्षय होना सम्भव नहीं है; हि कामोऽनात्मफलविषयत्वात् । │ क्योंकि अनात्मफलविषयिणी होनेके │ कारण कामना अनात्मवेत्ताको ही स्वात्मनि च कामानुपपत्तिर्नित्य- │ हुआ करती है । आत्मामें तो कामना- │ का होना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि प्राप्तत्वात् । स्वयं चात्मा परं │ वह नित्यप्राप्त है । और यह तो कहा │ ही जा चुका है कि स्वयं आत्मा ही ब्रह्मेत्युक्तम् । │ परब्रह्म है । नित्यानां चाकरणमभावस्ततः │ तथा नित्यकर्मोंका न करना तो │ अभावरूप है, उससे प्रत्यवाय होना प्रत्यवायानुपपत्तिरिति । अतः │ असम्भव है । अतः नित्यकर्मोंका न पूर्वोपचितदुरितेभ्यः प्राप्यमाणा- │ करना यह पूर्वसञ्चित पापोंसे प्राप्त │ होनेवाली प्रत्यवायक्रियाका ही याः प्रत्यवायक्रियाया नित्याकरणं │ लक्षण है । इसलिये “अकुर्वन् लक्षणमिति “अकुर्वन्विहितं कर्म” │ विहितं कर्म” इस वाक्यके │ ‘अकुर्वन्’ पदमें ‘शतृ’ प्रत्ययका (मनु० ११।४४) इति शतृ- │ होना अनुचित नहीं है । अन्यथा │ अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध होने- र्नानुपपत्तिः । अन्यथाभावाद्भा- │ के कारण सभी प्रमाणोंसे विरोध हो वोत्पत्तिरिति सर्वप्रमाणव्याकोप │ जायगा । अतः ऐसा मानना सर्वथा │ अयुक्त है कि [ कर्मानुष्ठानसे ] इति । अतोऽयत्नतः स्वात्मन्य- │ अनायास ही आत्मस्वरूपमें स्थिति वस्थानमित्यनुपपन्नम् । │ हो जाती है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri