तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९ प्रवेशक्रिययोश्चैकश्चेत्कर्ता ततः | सृष्टि और प्रवेशक्रियाका एक ही क्त्वाप्रत्ययो युक्तः । | कर्त्ता होगा तभी ‘क्त्वा’ प्रत्यय होना | युक्त होगा । प्रविष्टस्य तु भावान्तरापत्ति- | पूर्व०–प्रवेश कर लेनेपर उसे रिति चेत् ? | दूसरे भावकी प्राप्ति हो जाती है– | ऐसा माने तो ? न; प्रवेशस्यान्यार्थत्वेन | सिद्धान्ती–नहीं, क्योंकि प्रवेश- | का प्रयोजन दूसरा ही है–ऐसा प्रत्याख्यातत्वात् । “अनेन जीवे- | कहकर हम इसका पहले ही | निराकरण कर चुके हैं ।* यदि नात्मना” (छा० उ० ६ । ३ | कहो कि “अनेन जीवेन आत्मना” २) इति विशेषश्रुतेर्धर्मान्तरेणा- | इत्यादि विशेष श्रुति होनेके कारण | उसका धर्मान्तररूपसे ही प्रवेश नुप्रवेश इति चेत् ? न; “तत्त्वमसि” | होता है–तो ऐसा कहना ठीक नहीं; | क्योंकि “वह तू है” इस श्रुतिद्वारा इति पुनस्तद्भावोक्तेः । भावा- | पुनः उसकी तद्रूपताका वर्णन किया | गया है। और यदि कहो कि भावान्तर- न्तरापन्नस्यैव तदपोहार्था संप- | को प्राप्त हुए ब्रह्मके उस भावका | निषेध करनेके लिये ही वह केवल दिति चेत् ? न; “तत्सत्यं स | दृष्टिमात्र कही गयी है तो ऐसी बात | भी नहीं है; क्योंकि “वह सत्य है, आत्मा तत्त्वमसि” (छा० उ० | वह आत्मा है, वह तू है” इत्यादि | श्रुतिसे उसका परमात्माके साथ ६ । ८–१६) इति सामानाधि- | सामानाधिकरण्य सिद्ध होता है । करण्यात् । | दृष्टं जीवस्य संसारित्वमिति | पूर्व०–जीवका संसारित्व तो चेत् ? | स्पष्ट देखा है ।
- देखिये ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ६ का भाष्य । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri