तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१ कथमेकत्वमित्युच्यते-स यश्चायं | उसका एकत्व कैसे है ? सो सबका पुरुषे यश्चासावादित्ये स | सब पूर्ववत् 'वह जो कि इस पुरुषमें है और जो यह आदित्यमें एक इत्येवमादि पूर्ववत् | है एक है,' इस वाक्यद्वारा सर्वम् ॥४॥ | बतलाया गया है ॥४॥ आदित्य और देहोपाधिक चेतनकी एकता जाननेवाले उपासकको मिलनेवाला फल स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमय- मात्मानमुपसंक्रम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं विज्ञानमयमात्मान- मुपसंक्रम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य । इमाँ- ल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥ वह जो इस प्रकार जाननेवाला है इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट विषय-समूह) से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्माके प्रति संक्रमण कर, इस प्राणमय आत्माके प्रति संक्रमण कर, इस मनोमय आत्माके प्रति संक्रमण कर, इस विज्ञानमय आत्माके प्रति संक्रमण कर तथा इस आनन्दमय आत्माके प्रति संक्रमण कर इन लोकोंमें कामान्नी (इच्छा- नुसार भोग भोगता हुआ) और कामरूपी होकर (इच्छानुसार रूप धारण कर) विचरता हुआ यह सामगान करता रहता है—हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥ तै० उ० ३१- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri