भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३ कामाः प्रतिनियतानेकसाधन- | एवं प्रत्येकके लिये नियत अनेक साध्या आकाशादिकार्यभेद- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले जो सम्पूर्ण | भोग हैं वे भी दिखला दिये गये हैं। विषया एते दर्शिताः। एकत्वे | परन्तु यदि आत्माका एकत्व स्वीकार | किया जाय तब तो काम और पुनः कामकामित्वानुपपत्तिः। | कामित्वका होना ही असम्भव होगा; | क्योंकि सम्पूर्ण भेदजात आत्मस्वरूप भेदजातस्य सर्वस्यात्मभूतत्वात्। | ही है। ऐसी अवस्थामें इस प्रकार | जाननेवाला उपासक ब्रह्मरूपसे तत्र कथं युगपद्ब्रह्मस्वरूपेण | किस प्रकार एक ही साथ सम्पूर्ण | भोगोंको प्राप्त कर लेता है? सो सर्वान्कामानेवंवित्तसमश्नुत इत्यु- | बतलाया जाता है—उसका सर्वात्म- | भाव सम्भव होनेके कारण ऐसा हो च्यते—सर्वात्मत्वोपपत्तेः। | सकता है।* कथं सर्वात्मत्वोपपत्तिरित्याह- | उसका सर्वात्मत्व किस प्रकार | सम्भव है ? सो बतलाते हैं—पुरुष पुरुषादित्यस्यात्मैकत्वविज्ञानेना- | और आदित्यमें स्थित आत्माके | एकत्वज्ञानसे उनके उत्कर्ष और पोह्योत्कर्षापकर्षावन्नमयाद्यात्मनो- | अपकर्षका निराकरण कर आत्माके | अज्ञानसे कल्पना किये हुए अन्नमयसे ऽविद्याकल्पितान्क्रमेण संक्रम्या- | लेकर आनन्दमयपर्यन्त सम्पूर्ण | कोशोंके प्रति संक्रमण कर जो सबका नन्दमयान्तान्सत्यं ज्ञानमनन्तं | फलरूप है उस अदृश्यादि धर्म- ब्रह्मादृश्यादिधर्मकं स्वाभाविक- | वाले स्वाभाविक आनन्दरूप

  • तात्पर्य यह है कि जो ब्रह्मकी अभेदोपासना करते-करते उससे तादात्म्य अनुभव करने लगता है वह सबका अन्तरात्मा ही हो जाता है; इसलिये सबके अन्तरात्मस्वरूपसे वह सम्पूर्ण भोगोंको भोगता है। CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri