भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 261 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 254

२४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३


[वाम स्तम्भ / संस्कृत भाष्य]

दिदोषगन्धोऽप्यविद्यानिमित्तो- ऽविद्योच्छेदाद्ब्रह्मभूतस्य नास्तीति । अहं विश्वं समस्तं भुवनं भूतैः संभजनीयं ब्रह्मादिभिर्भवन्तीति वास्मिन्भूतानीति भुवनमभ्यभवा- मभिभवामि परेणेश्वरेण स्वरू- पेण । सुवर्न ज्योतिः सुवरा- दित्यो नकार उपमार्थे । आदित्य इव सकृद्विभातमस्मदीयं ज्योति- र्ज्योतिः प्रकाश इत्यर्थः । इति वल्लीद्वयविहितोपनिष- त्परमात्मज्ञानं तामेतां यथोक्ता- मुपनिषदं शान्तो दान्त उपरत- स्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा भृगु- वत्तपो महदास्थाय य एवं वेद तस्येदं फलं यथोक्तमोक्ष इति ॥ ६ ॥


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]

विद्वान्को अविद्याके कारण होनेवाले भय आदि दोषका गन्ध भी नहीं होता । मैं अपने श्रेष्ठ ईश्वररूपसे विश्व यानी सम्पूर्ण भुवनका पराभव ( उपसंहार ) करता हूँ । जो ब्रह्मादि भूतों (प्राणियों) के द्वारा संभजनीय (भोगे जाने योग्य) है अथवा जिसमें भूत (प्राणी) होते हैं उसका नाम भुवन है। 'सुवर्न ज्योतिः'—'सुवः' आदित्यका नाम है और 'न' उपमाके लिये है; अर्थात् हमारी ज्योति—हमारा प्रकाश आदित्यके समान प्रकाशमान है। इस प्रकार इन दो वल्लियोंमें कही हुई उपनिषत् परमात्माका ज्ञान है। इस उपर्युक्त उपनिषत्को जो भृगु- के समान शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर महान् तपस्या करके इस प्रकार जानता है उसे यह उपर्युक्त मोक्षरूप फल प्राप्त होता है ॥ ६ ॥


इति भृगुवल्ल्यां दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्कर- भगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये भृगुवल्ली समाप्ता ॥ समाप्तेयं कृष्णयजुर्वेदीया तैत्तिरीयोपनिषत् ॥


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri