तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] २० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ / Left Column - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
भावप्रतियोगी ह्यभावः । यथा ह्यभिन्नोऽपि भावो घट- पटादिभिर्विशेष्यते भिन्न इव घटभावः पटभाव इति; एवं निर्विशेषोऽप्यभावः क्रिया- गुणयोगाद्द्रव्यादिवद्विकल्प्यते । न ह्यभाव उत्पलादिवद्विशेषण- सहभावी । विशेषणवत्त्वे भाव एव स्यात् । विद्याकर्मकर्तृनित्यत्वाद्विद्या- कर्मसन्तानजनितमोक्षनित्यत्व- मिति चेत् ? न; गङ्गास्रोतोवत्कर्तृत्वस्य दुःखरूपत्वात् । कर्तृत्वोपरमे च मोक्षविच्छेदात् । तस्मादविद्या- कामकर्मोपादानहेतुनिवृत्तौ स्वा- त्मन्यवस्थानं मोक्ष इति । स्वयं
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column - हिन्दी अनुवाद]
प्रतियोगी ही 'अभाव' कहलाता है । जिस प्रकार भाव वस्तुतः अभिन्न होनेपर भी घट-पट आदि विशेषणोंसे भिन्नके समान घटभाव, पटभाव आदि रूपसे विशेषित किया जाता है इसी प्रकार अभाव निर्विशेष होनेपर भी क्रिया और गुणके योगसे द्रव्यादिके समान विकल्पित होता है । कमल आदि पदार्थोंके समान अभाव विशेषणके सहित रहनेवाला नहीं है । विशेषण- युक्त होनेपर तो वह भाव ही हो जायगा । पूर्व०-विद्या और कर्म इनका कर्ता नित्य होनेके कारण विद्या और कर्मके अविच्छिन्न प्रवाहसे होनेवाला मोक्ष नित्य ही होना चाहिये । ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, गङ्गाप्रवाहके समान जो कर्तृत्व है वह तो दुःख- रूप है । [अतः उससे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती, और यदि उसीसे मोक्ष माना जाय तो भी ] कर्तृत्वकी निवृत्ति होनेपर मोक्षका विच्छेद हो जायगा । अतः अविद्या, कामना और कर्म-इनके उपादान कारणकी निवृत्ति होनेपर आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही मोक्ष है-यह सिद्ध
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