तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ हमारे लिये सुखावह हो । [ नेत्र और सूर्यका अभिमानी देवता ] अर्यमा हमारे लिये सुखप्रद हो । बलका अभिमानी इन्द्र तथा [ वाक् और बुद्धिका अभिमानी देवता ] बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हो । तथा जिसका पादविक्षेप ( डग ) बहुत विस्तृत है वह [ पादाभिमानी देवता ] विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [ रूप वायु ] को नमस्कार है । हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हींको मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हींको ऋत ( शास्त्रोक्त निश्चित अर्थ ) कहूँगा और [ क्योंकि वाक् और शरीरसे सम्पन्न होनेवाले कार्य भी तुम्हारे ही अधीन हैं इसलिये ] तुम्हींको मैं सत्य कहूँगा । अतः तुम [ विद्यादानके द्वारा ] मेरी रक्षा करो तथा ब्रह्मका निरूपण करनेवाले आचार्यकी भी [ उन्हें वक्तृत्व-सामर्थ्य देकर ] रक्षा करो । मेरी रक्षा करो और वक्ताकी रक्षा करो । आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकारके तापोंकी शान्ति हो ॥ १ ॥ शं सुखं प्राणवृत्तेरहश्चाभि- | प्राणवृत्ति और दिनका अभिमानी मानी देवतात्मा मित्रो नोऽस्माकं | देवता मित्र हमारे लिये शं सुखरूप भवतु । तथैवापानवृत्ते रात्रेश्चाभि- | हो । इसी प्रकार अपानवृत्ति और | रात्रिका अभिमानी देवता वरुण, मानी देवतात्मा वरुणः । चक्षु- | नेत्र और सूर्यमें अभिमान करनेवाला ष्यादित्ये चाभिमान्यर्थमा । | अर्यमा, बलमें अभिमान करनेवाला बल इन्द्रः । वाचि बुद्धौ च | इन्द्र, वाणी और बुद्धिका अभिमानी | बृहस्पति तथा उरुक्रम अर्थात् बृहस्पतिः । विष्णुरुरुक्रमो वि- | विस्तीर्ण पादविक्षेपवाला पादाभिमानी स्तीर्णक्रमः पादयोरभिमानी । | देवता विष्णु-इत्यादि सभी अध्यात्म- एवमाध्यात्मदेवताः शं नः । | देवता हमारे लिये सुखदायक हों । | 'भवतु' ( हों ) इस क्रियाका सभी भवत्विति सर्वत्रानुषङ्गः । | वाक्योंके साथ सम्बन्ध है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri