तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९ करनी चाहिये ] । यह विद्यासम्बन्धी दर्शन कहा गया । इससे आगे अधिप्रज दर्शन कहा जाता है—यहाँ संहिताका प्रथम वर्ण माता है, अन्तिम वर्ण पिता है, प्रजा ( सन्तान ) सन्धि है और प्रजनन ( ऋतु- कालमें भार्यागमन ) सन्धान है [—अधिप्रज-उपासकको ऐसी दृष्टि करनी चाहिये ] । यह प्रजासम्बन्धी उपासनाका वर्णन किया गया ॥ ३ ॥ इसके पश्चात् अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—इसमें संहिताका प्रथम वर्ण नीचेका हनु ( नीचेके होठसे ठोडीतकका भाग ) है, अन्तिम वर्ण ऊपरका हनु ( ऊपरके होठसे नासिकातकका भाग ) है, वाणी सन्धि है और जिह्वा सन्धान है [—ऐसी अध्यात्म-उपासकको दृष्टि करनी चाहिये ] । यह अध्यात्मदर्शन कहा गया । इस प्रकार ये महासंहिताएँ कहलाती हैं । जो पुरुष इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासंहिताओंको जानता है [ अर्थात् इस प्रकार उपासना करता है ] वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज, अन्न और स्वर्गलोकसे संयुक्त किया जाता है । [ अर्थात् उसे इन सबकी प्राप्ति होती है ] ॥ ४ ॥ तत्र संहिताद्युपनिषत्परिज्ञा- | उस संहितादि उपनिषद् [ अर्थात् संहितादिसम्बन्धिनी ननिमित्तं यद्यशः प्रार्थ्यते तन्ना- | उपासना ] के परिज्ञानके कारण जिस यशकी याचना की जाती है वावयोः शिष्याचार्ययोः सहैवा- | वह हम शिष्य और आचार्य दोनोंको साथ-साथ ही प्राप्त हो । तथा स्तु । तन्निमित्तं च यद्ब्रह्मवर्चसं | उसके कारण जो ब्रह्मतेज होता है तेजस्तच्च सहैवास्त्विति शिष्य- | वह भी हम दोनोंको साथ-साथ ही मिले—इस प्रकार यह कामना शिष्य- वचनमाशीः । शिष्यस्य ह्यकृतार्थ- | का वाक्य है; क्योंकि अकृतार्थ होनेके कारण शिष्यके लिये ही त्वात्प्रार्थनोपपद्यते नाचार्यस्य । | प्रार्थना करना सम्भव भी है— आचार्यके लिये नहीं; क्योंकि वह कृतार्थत्वात् । कृतार्थो ह्याचार्यो | कृतार्थ होता है । जो पुरुष कृतार्थ होता है वही आचार्य कहलाता है । नाम भवति । |
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri