तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ यशो जनेऽसानि स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा । यथापः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम् । एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि प्र मा पाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३ ॥ मैं जनतामें यशस्वी होऊँ—स्वाहा । मैं अत्यन्त प्रशंसनीय और धनवान् होऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! मैं उस ब्रह्मकोशभूत तुझमें प्रवेश कर जाऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! वह तू मुझमें प्रवेश कर--स्वाहा । हे भगवन् ! उस सहस्रशाखायुक्त [ अर्थात् अनकों भेदवाले ] तुझमें मैं अपने पापा- चरणोंका शोधन करता हूँ—स्वाहा । जिस प्रकार जल निम्न प्रदेशकी ओर जाता है तथा महीने अहर्जर—संवत्सरमें अन्तर्हित हो जाते हैं, उसी प्रकार हे धातः ! ब्रह्मचारीलोग सब ओरसे मेरे पास आवें-- स्वाहा । तू [ शरणागतोंका ] आश्रयस्थान है अतः मेरे प्रति भासमान हो, तू मुझे प्राप्त हो ॥ ३ ॥ यशो यशस्वी जने जनसमूहे- | मैं जनतामें यशस्वी होऊँ तथा ऽसानि भवानि। श्रेयान्प्रशस्यतरो | श्रेयान्-प्रशस्यतर और वस्यसः- वस्यसो वसीयसो वसुतराद्वसुमत्त- | वसीयसः अर्थात् वसुमान्से भी राद्वासानीत्यन्वयः । किं च तं | वसुमान् यानी अत्यन्त धनी पुरुषों- से भी विशेष धनवान् होऊँ । तथा ब्रह्मणः कोशभूतं त्वा त्वां हे भग | हे भग-भगवन्-पूजनीय ! ब्रह्मके कोशभूत उस तुझमें मैं प्रवेश करूँ; भगवन्पूज्यावन्प्रविशानि प्रविश्य | तात्पर्य यह है कि तुझमें प्रवेश करके चानन्यस्त्वदात्मैव भवानीत्यर्थः। | तुझसे अनन्य हो मैं तेरा ही रूप CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri