तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
मां रसविद्धमिव लोहं तन्मयं | पारदसंयुक्त लोहेके समान तू मुझे त्वदात्मानं कुर्वित्यर्थः । | अपनेसे अभिन्न कर ले । श्रीकामोऽस्मिन्विद्याप्रकरणे- | इस ज्ञानके प्रकरणमें जो लक्ष्मी- <sub>विद्योपलब्धौ धनस्योपयोगः</sub> ऽभिधीयमानो धना- | की कामना कही जाती है वह धनके र्थः । धनं च कर्मा- | लिये है, धन कर्मके लिये होता है, र्थम् । कर्म चोपात्तदुरितक्षयाय । | और कर्म प्राप्त हुए पापोंके क्षयके तत्क्षये हि विद्या प्रकाशते । तथा | लिये है । उनके क्षीण होनेपर ही च स्मृतिः "ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां | ज्ञानका प्रकाश होता है; जैसा कि क्षयात्पापस्य कर्मणः । यथादर्श- | यह स्मृति भी कहती है—"पाप- तले प्रख्ये पश्यन्त्यात्मान- | कर्मोंका क्षय हो जानेपर ही पुरुष- मात्मनि" (महा० शा० २०४ । | को ज्ञान होता है । जिस प्रकार ८, गरुड० १ । २३७ । ६ ) | दर्पणके स्वच्छ हो जानेपर उसमें इति ॥ ३ ॥ | मुख देखा जा सकता है उसी प्रकार शुद्ध अन्तःकरणमें आत्माका साक्षात्कार होता है" ॥ ३ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥