तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [_वल्ली १ धर्मविशिष्टं साक्षादुपलभ्यते | ब्रह्म हथेलीपर रखे हुए आँवलेके पाणाविवामलकम् । मार्गश्च | समान साक्षात् उपलब्ध होता है । सर्वात्मभावप्रतिपत्तये वक्तव्य | इसके सिवा सर्वात्मभावकी प्राप्तिके लिये मार्ग भी बतलाना है, इसलिये इस . इत्यनुवाक आरभ्यते— | अनुवाकका आरम्भ किया जाता है— स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले । भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ॥ १ ॥ सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतत्ततो भवति । आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम् । शान्ति- समृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्स्व ॥ २ ॥ यह जो हृदयके मध्यमें स्थित आकाश है उसमें ही यह मनोमय अमृत- स्वरूप हिरण्मय पुरुष रहता है । तालुओंके बीचमें और [ उनके मध्य ] यह जो स्तनके समान [ मांसखण्ड ] लटका हुआ है [ उसमें होकर जो सुषुम्ना नाडी ] जहाँ केशोंका मूलभाग विभक्त होकर रहता है उस मूर्धप्रदेशमें मस्तकके कपालोंको विदीर्ण करके निकल गयी है वह इन्द्रयोनि [ अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिका मार्ग ] है । [ इस प्रकार उपासना करनेवाला पुरुष प्राणप्रयाणके समय मूर्धाका भेदन कर ] 'भूः' इस व्याहृतिरूप अग्निमें स्थित होता है [ अर्थात् 'भूः' इस व्याहृतिका चिन्तन करनेसे अग्नि- रूप होकर इस लोकको व्याप्त करता है ] । इसी प्रकार 'भुवः' इस CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri